Wednesday, September 17, 2014

सन्निधि संगोष्ठी


सन्निधि संगोष्ठी दिल्ली में होने वाली साहित्यक गतिविधियों का अब एक जरूरी पन्ना बनता जा रहा है। इसका सतत आयोजन एक उपलब्धि की तरह है। मेरे पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत की इस आयोजन को सफल और सतत बनाने में बड़ी भूमिका रही है। इस बारे में समय-समय पर उनसे बातचीत भी होती रही। यह मैं अपना दुर्भाग्य या पत्रकारीय पेशे की मजबूरी मानता हूं कि अब तक मैं इस गोष्ठी में शरीक नहीं हो सका।
इस बार 21 सितंबर को यह गोष्ठी होगी। मेरे लिए संतोष और खुशी की बात है इस बार मैं भी इसका हिस्सा बनने जा रहा हूं।
इस बार की गोष्ठी में की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र कर रहे हैं। 'सिनेमा और हिंदी’ विषय पर मुख्य वक्ता हैं विनोद भारद्बाज। मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं प्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. किरण पाठक और मुझ कलम घसीट को आयोजकों ने बुलाया है। 

Tuesday, June 10, 2014

बैंक में जमा पेड़

कॉलोनी का सातवां
और उसके आहाते का
आखिरी पेड़ था
जमा कर आया जिसे वह
अजन्मे पत्तों के साथ बैंक में
इससे पहले
बेसन मलती बरामदे की धूप
आलते के पांव नाचती सुबह
बजती रंगोलियां
रहन रखकर खरीदा था उसने
हुंडरु का वाटरफॉल

निवेश युग के सबसे व्यस्त चौराहे पर
गूंजेंगी जब उसके नाम की किलकारी
समय के सबसे खनकते बोल
थर-थराएंगे जब
पुश्तैनी पतलून का जिप चढ़ाते हुए
खड़ी होगी जब नई सीढ़ी
पुरानी छत से छूने आसमान
तब होगी उसके हाथों में
दुनिया के सबसे महकते
फूलों की नाममाला
फलों की वंशावली
पेड़ों के कंधों पर झूलता
भरत का नाट्यशास्त्र

बांचेगा वह कानों को छूकर
सन्न से गुजर जाने वाली
हवाओं के रोमांचक यात्रा अनुभव
आंखों के चरने के लिए होगा
एक भरा-पूरा एलबम
तितलियों के इशारों पर
डोलते-गाते मंजर
मिट्टी सोखती
पानी की आवाज बजेगी
उसके फोन के जागरण के साथ

पर वे पेड़
जहां झूलते हैं उसके सपने
वे आम-अमरूद और जामुन
चखती जिसे तोतों की पहली मौसमी पांत
वह आकाश
जहां पढ़ती हैं अंगुलियां अपने प्यार का नाम
वह छाया
जिसे बगीचे चुराते धूप से
वह धूल
जहां सनती गात बांके मुरारी की
कहां होंगे
किन पन्नों पर होगी
इनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट
हारमोनियम से बजते रोम-रोम
किस बारहमासे से बांधेंगे युगलबंदी
आएंगे पाहुन कल भोर भिनसारे
कौवे किस मुंडेर पर गाएंगे
हमें देखकर कौन रोएगा
हम किसे देखकर गाएंगे

Sunday, January 6, 2013

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

Sunday, July 8, 2012

डेस्क पर दुष्कर्म


रौंदे गए खेत की तरह
पहुंची वह डेस्क पर
भरभरा कर ढहती
मिट्टी का सिलसिला
शिथिल पड़ गया था
पर थमा नहीं था बिल्कुल
पुलिस लग गई थी छानबीन में
सुराग की छेद में समाया था
टीचर से ब्वॉयफ्रेंड बना गिरिधारी

कवर की बॉटम होगी
पूरे पांच कॉलम की
उघड़ी खबर की आंखें
कल शहर की तमाम आंखों की
तलाशी लेगी

घबराना नहीं तुम
छंटने लगे बेहोशी तब भी
कल कोई नहीं पहचानेगा
भरभरा कर झरती
दोबारा इस मिट्टी को
बदनाम तो होगी वह
जिसे सूंघते फिरंगे सब
सड़कों-मोहल्लों पड़ोस में
और हम
हम तो होंगे बस
पेशेवर चश्मदीद
भेड़ियों की पीठ पर
शरारतन धौल जमाते

अगले नाम से फिर एक बार
दोहराया गया दुष्कर्म
हौले-हौले फूंक-फूंककर
मर्दाना शहर में बढ़ गई अचानक
मांदों की गिनती
पिछले साल पांच सौ छब्बीस
इस साल अगस्त तक
चार सौ इक्कीस

स्कूल में पढ़ने वाली
मालती को क्या पता था
सबक याद कराने वाला मास्टर
उसे क्या रटा रहा है
देर शाम बेहोश मिली मालती
कोचिंग सेंटर के आखिरी कमरे में

चालीस फोंट की बोल्ड हेडिंग
लुट गई मालती दिन-दहाड़े
खुलती आंखों का भरोसा
फिर से सो गया
लोकशाही के चौथे खंभे का
हथकंडा देखकर

Monday, June 4, 2012

क्लिंटन पीढ़ी का मर्द


तुम्हें तो पंख मिले हैं फितरतन
जाओ न उड़ो तुम भी
कहो कि मेरा है आकाश

क्यों
आखिर क्यों चाहिए तुम्हें
उतनी ही हवा
जितनी उसके बांहों के घेरे में है
क्यों है जमीन उतनी ही तुम्हारी
जहां तक वह पीपल घनेरा है

सुनी नहीं बहस तुमने टीवी पर
बिन ब्याही भी पूरी है औरत
क्या बैर है तुम्हारा उन सहेलियों से
जिनके पर्स में रखी माचिस
कहीं भी और कभी भी
चिंगारी फेंकने के लिए रहती है तैयार

बताओ आखिर
क्या मतलब है इसका
कि एक आईना भी नहीं है तुम्हारे पास
उसे छोड़कर
जिसमें तुम संवर सको
मलिका बन सको दुनिया जहान की

तुमने तो देखी भी नहीं होगी
टांगें अपनी ऊपर से नीचे तक
पता भी है तुम्हें
कि जिन अलग-अलग नंबरों से
घेरती-बांधती हो खुद को
उसका जरूरत से ज्यादा बटनदार होना
आजादी की असीम संभावनाओं का गला घोंटना है

जानती नहीं तुम
कि छलनी से चांद निहारने की आदत तुम्हारी
आक्सीजन में मिलावट है उसके लिए
खांसने लगता है वह
हांफती है जिंदगी उसकी
तुम्हारे बस उसके कहलाने से

तुम भले बनना चाहो उसकी मैना
वह तुम्हारे दरख्त का तोता नहीं बन सकता
वन बचाओ मुहिम का एक्टिविस्ट वह
जंगली है पूरी तरह से

तुम्हें अहसास नहीं शायद
कि बेटी हो तुम उस सौतेली सोच की
जो पूरी जिंदगी सोखा आती है
अपने बाप का हुलिया जानने में
माफ करना साथिन
बिल क्लिंटन की पीढ़ी का मर्द
इससे ज्यादा ईमानदार नहीं हो सकता
कि रात ढले तक तुम्हें
अपनी दबोच से आजाद रखे

Sunday, April 22, 2012

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो...!


आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई  और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं है। दरअसल, चोरी एक ऐसी कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतने व्यापक हों उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क  यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर एक आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गया है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है। जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी।  
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। अपने यहां बोलचाल और पढ़ाई-लिखाई में हम हिंदी का तो इस्तेमाल करते ही हैं अंग्रेजी का भी जोर तेजी से बढ़ा है। एक खिचड़ी भाषा मोबाइल इंटरनेट की देसी भाषा बनकर इस दौरान उभरी है जिसे हिंग्रेजी कहा जा रहा है।
अब जरा इन शब्दों की नई बनती दुनिया को देखें। 'उदार' शब्द हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता रहा है। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया। दिलचस्प है कि 'उदारवाद' के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है। 
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन नहीं। शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
न्यू क्रिटिसिज्म में शब्दों को 'टेक्स्ट' की तरह देखने की दरकार रखी गई हैं। यानी शब्दों की यात्रा अर्थ तक जाकर समाप्त नहीं हो जाती बल्कि समय और संदर्भ के तमाम हवालों को वह अपने से जोड़ता है। पर दुर्भाग्य से शब्दों की हमारी दुनिया आज उन चोरों के हाथों चली गई है, जिनकी हैसियत कस्बाई या क्षेत्रीय नहीं बल्कि ग्लोबल है। ग्लोबल चोरी को मान्यता सरकारों ने तो दी ही है, हमारा समय और समाज भी इस तरह की चोरी पर खामोश तो क्या उसका हिमायती बन गया है।

Monday, January 9, 2012

वीरांगनाओं की युद्धनीति


कूल्हों के झटकों पर
मौसम नहीं बदलते
शेयर दलालों की बांछें भले खिल जाएं
उघड़ी टांगों पर तैरती फिसलन
या तो बरसाती है
या सोची-समझी शरारत

पेज थ्री की जंघाओं में
मचलती जिन मछलियों ने
ड्राइंग रूम के लिए
कराया है इक्वेरियम का अविष्कार
समझ लेना होगा उन्हें
कि रैंप पर चलने वालों को
पहाड़ पर चढ़ना मना है

रेन डांस में लहराती गोपिकाओं से
जबरिया छीन लिया गया है
मटका भरने का हुनर
न्योन लाइट से सजे इश्तेहार
बस नीले हो सकते हैं
या हो सकते हैं खतरनाक लाल
पाबंदी है इनके सिंदूरी होने पर

रंग-बिरंगी लट्टुओं में नहायी दुनिया के
सबसे ताकतवर मदारी का डमरू
तांडवी हो जाता है
उम्रदराज झुर्रियों को देखकर
लंबी छरहरी गुस्ताखियों के लिए
शहर के हाशिये पर बना ओल्डएज होम
नया रिलिजियस स्पॉट है
कच्चे सूत से पक्की गांठ बांधने वाला
पंडित भी फूंक नहीं पा रहा कोई मंत्र
जिससे दुनिया के सारे फोटोग्राफरों के
निगेटिव एक साथ धुल जाएं

अलबत्ता सवाल यह भी है कि
अब तक आंगन लीप रही औरतों
कोहबर सजा रही लड़कियों की दुनिया
किस छाते में खड़ी है
किन जंघाओं में खेलती हैं ये
सपनों के किन बगीचों में मिल जाती हैं
नीम कौडि़यां इन्हे आज भी

नया भूगोल ढूंढ़ रहे वास्कोडिगामा
है कमीज तुम्हारे पास
जिसे पहन तुम
नया सबेरा आंज रही
इन ललनाओं से मिल सको
खतरा है इतिहास लिख रहे
नये मिस्त्रियों के औजार
कहीं लूल्हे साबित न हों
सुंदर पति पाने के लिए
अब भी सोमवारी करतीं
वीरांगनाओं की युद्धनीति समझने में