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Monday, December 3, 2018

मोमबत्ती का यह उजाला


दूब-घास का हरा मटमैला संसार
गांव-गंवई का देशज विस्तार
एक बिंदू को जबरन रेखा बना देना
अबीरी उल्लास का
सिंदूरी भार से दब जाना
एक सपनीली रात का गर्भपात
संस्कृति का अपनी ही बेटी के साथ
परंपरागत विश्वासघात है

अनुभव की यह दुहाई
पहले एक लड़की देती थी
अब एक औरत देती है
अपनी ही आंखों में
ओझल हुए सपनों को
चिड़ियों की तरह बुलाते हुए
भाषा की अंजुरी में अपने आंचल का
सबसे कीमती प्रसाद रखते हुए
मानवता की देहरी पर
अंतिम दीया बालते हुए

एक औरत में
एक लड़की की खोज पूरी करना
सिंदूर की लाली को
मलाल से भर देना नहीं
एक अहसास को
तर-बतर कर देना है
एक सुखी नदी को
फिर से सजल कर देना है
दिल को तार और
दिमाग को बुखार लिखने वाले
हैरान हो सकते हैं
साड़ी के कोर को
फ्रॉक का रिबन बनते देख

कौमार्य को धो देने
जवानी को खो देने के बाद भी
बची रह जाती है एक लड़की
संवेदना की किसी निर्जन बस्ती में
शब्दों के बगीचे में
किसी अनजान डाल पर
झूलते हुए झूला
भरती हुई किलकारी
लहराती हुई केश

अंगों के स्पर्श को
इच्छाओं के संघर्ष को
अनुभूति के द्वंद्व का नाम देकर
दुनिया चाहे लाख खेलती हो
शह-मात का खेल
पर 21वीं सदी के
दूसरे दशक की दस्तक बनी
आधी दुनिया ने
खेल के सारे नियम बदल दिए हैं
धोखे से प्यार चखने वाले
अब प्यार के नए
चोखे हथियार से हार रहे हैं
इश्किया मुहावरों की
अपनी थाती को
अपने ही हाथों सिधार रहे हैं

आज ऐसी ही एक लड़की ने
औरत के जिस्म से बाहर आकर
जलाई है मोमबत्ती
अपने नाम से
अपने जन्म लेने की
सालाना घोषणा करते हुए
मोमबत्ती का यह उजाला
हमारे समय के
सबसे घनघोर
अंधकार के खिलाफ है

Saturday, September 22, 2018

शुष्कता अब शर्मनाक है



अच्छा है नभ बरस रहा है
बाहर-अंदर सब भींग रहा है
घोषित है हर ओर आद्रता
                पानी से मनमानी खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

सोचा था वो एेसे होंगे
सोचा था वो वैसे होंगे
सोचा उसकी सोच के बाबत
                सोच बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

पूरब को पुरबाई कह देना
वचन-वचन को गहराई
कुछ को कुछ लिख देना यूं ही
                आदत बहुत खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

कुछ शब्द लिफाफे के भीतर
कुछ बात दबे तकिए के नीचे
कुछ शब्द हो गए सहयात्री
                संवाद बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

#रोप्रे
22.09.18

Thursday, September 13, 2018

बोल


तू बोले तो
तिमिर तम घोर
तू बोले तो
भोरमभोर


कड़वे बोल
मीठे बोल
तू बोले तो
सब अनमोल


मेरी जिह्वा
मेरी वाणी
नहीं चाहिए
उनका मोल


13.09.18

Tuesday, September 11, 2018

दुविधा का समंदर


जिसे पाया नहीं
खोना उसका भी
कचोट देता है

जिसे गाया नहीं
उतरना उसका अधरों से
मन मसोस देता है

दोपहर सा मन
हर तरलता
सोख लेता है

दुविधा का समंदर
मांझी को हर बार
टोक देता है

सोच की
दुबली रेखा जो
अकेली ही गुजरती है

अकेले होने का खतरा
अच्छे-अच्छों को
दबोच लेता है

11.09.18

Monday, September 3, 2018

युगल अवतरण


ईश्वर के पहरे में
सोया है ताल
नीरवता का श्लेष
एकांत का रूपक नहीं
प्रकृति और आस्था का
युगल अवतरण
छवि और छाया का
मिलन बोध है

वृक्षों की छाया का
सघन पत्राचार
मंदिर की महिमा से
सीधे भगवान से
द्वैत के दर्शन का
अद्वैत बोध है

यहां आकर सूरज
बदलता है कपड़े
यहीं चांदनी
अपना धरती श्रृंगार है
यहीं आकर
उसने भिंगाया था मुझको
यहीं पर बसा
वो सजल याद है

03.09.18





Sunday, September 2, 2018

वायरल फीवर


दुनिया में पहला वायरल फीवर
गंदा पानी पीने
या कुछ भी ऐसा-वैसा खाने से नहीं हुआ होगा
मेडिकल साइंस को मान लेनी चाहिए यह बात
और बंद करना चाहिए
दुनिया के पहले रोग
पहले बुखार के खिलाफ प्रोपेगेंडा वार

वायरल फीवर की पहली
और आखिरी वजह एक है
और वह वजह सेब है
वह सेव जिसे कभी प्रेम का
तो कभी पाप का फल कहा गया
पर जैसा वह पहली बार चखा गया
वैसा फिर नहीं चखा गया

सेब अब अपने पेड़ों पर कम
बाजार में ज्यादा हैं
अब भी खाते हैं लोग उसे
पर नहीं खाता कोई सेब 
किसी अंतरंग प्रस्तावना से पहले
तर-बतर आस्था के साथ

मनुहारी चर्चा के बीच
 सेब की जगह अब शिलाजीत है
प्यार अब वायरल फीवर का नहीं
एक खुराक का नाम है

Saturday, September 1, 2018

मोहल्ले का नायक


गर्म धूप की सेंक से
पक रही हैं लड़कियां
मोहल्ले की लड़कियां
फरवरी के महीने में
बरामदे की कुर्सियों पर
छत पर बिछी चटाई पर
खुले लॉन में
ऊन के फंदों में
कस रही हैं लड़कियां
बैडमिंटन के कोर्ट में
शटल के पंखों से
उड़ रही हैं लड़कियां

लड़कों का क्रिकेट बॉल
उड़ा ला रहे हैं लड़कियों की बातें
नयी पकी खुशबू की सौगातें
नहीं कर पा रहे हैं यही काम
ऊपर उड़ रहे कई पतंग
प्रयास के बावजूद

सबको पता है कि
शाम से पहले तीन-साढ़े तीन बजे
इस वासंती मुहूर्त का नायक यहां नहीं है
वहां लड़कियों की बातों से भी
उसकी टोह मुश्किल है
बची कविता
तो वह भला यहां कैसे हो सकता है
वैसे यह कहना भी फिजूल है
यह जानने के बाद कि
वह धड़कनों का चित्रकार है
और इस साल वसंत के पास
उसी की कूची से धुला आईडेंटीटी कार्ड है

Friday, August 31, 2018

लीन


आशा में क्षीण होना

आकांक्षा में निम्न होना

अपेक्षा में दीन होना

प्रेम में शून्य होना नहीं

संवेदना में लीन होना है

कविता में शालीन होना है

Saturday, October 8, 2011

स्पर्शसुख का जैकपॉट


पहला शब्द पुरुष
फिर चुनिंदा फूल
और भीना-भीना प्यार
गोदने की तरह
चमड़ी में उतरे हैं शब्द कई
नीले-नीले हरे कत्थई
नंगी पीठ पर उसकी
थोड़ा ऊपर
बस वहीं
एकदम पास
उत्तेजना की चरमस्थली
स्पर्शसुख का जैकपॉट

सच
शादी की रजत वर्षगांठ पर
वह सिर्फ पति नहीं
उस कला संग्रहालय का
मालिक भी है
जहां के हर बुत में 
उतनी ही जान है
जितनी हथेली और
नाखूनों को चाहिए

Sunday, October 2, 2011

सौ नंबर पर प्यार


पांव से छिटककर दूर
जब बजने लगे पायल
तो बदहवासी में
सौ नंबर पर डॉयल

मनुहार का अत्याचारी सच
बयां करने वाली
पुलिस थाने में धूल खा रही फाइल
प्यार के चर्मरोग का
इलाज बताएं न बताएं
इस बीमारी के गलगला गए
यथार्थ को मुहरबंद जरूर करती हैं

Monday, August 8, 2011

वफादार प्रेमियों का टूटा मिथक


दढ़ियल पांडेय जी की प्रेमिका
चिकने बांके द्विवेदी की जांघ पर
कल दोपहर बेसुध मिली
खबर यह इतनी बड़ी कि
दंगों के दौरान पैदा होने वाली
सनसनी भी खोलने लगी
आंचल की पुरानी गांठ

ठाकुर साहब की पूर्व ब्याहता
खिड़की के रास्ते दाखिल होकर
आवारा कुमार के संग
एक ही तकिए पर भिगोती रही रात
झूलती रही झूला
कई सालों तक एक साथ
सचाई यह इतनी बड़ी कि
तथ्य से बड़े सच की तरह
करने लगे सब
मन मसोसकर स्वीकार

प्रेमिका का प्रेम ज्यादा बदला
प्रेमियों के नामों के मुकाबले
प्रेम के बहाने स्त्री अनुभूति का
नया प्रस्थान बिंदु
कितना सघन
कितना सिंधु
रिक्शे पर भाग-भागकर
पुराने प्रेम की गलियों को छोड़ना पीछे
बाइक उड़ा रहे प्रेमी के साथ भरना उड़ान
सपनों से भी आगे क्षितिज के भी पार
नए प्रेम पयर्टन का रोड मैप है
सफर की इस जल्दबाजी में
जो छूट गया पीछे
वह कुछ और नहीं
बस जेनरेशन गैप है

प्रेम एक अनुभव
एक अंतराल लगातार
और दूर तक बजता जलतरंग
एतराज सिर्फ उन्हें जिनके नाखूनों से
छूटने लगे मांसल एहसास
गन्ने के खेत को जो लोग
गुड़-चीनी बनते देखने के हैं आदी
उनके लिए प्रेम होता है
हमेशा रंगीन आख्यान
दांत कटे होठों से
अश्लील शर्बत का पान

प्रेमिकाएं अब बांदी नहीं
पुरुष एहसास के जंगलों को मनमाफिक
झकझोर देनेवाली आंधी हैं
शर्मिंदगी का ऐनक चमकाकर
नहीं मिटाया जा सकता
उनकी आंखों के तीखेपन को
काढ़ने वाला काजल

प्रेम का रंग सिंदूरी नहीं अबीरी है
सौभाग्यवतियों के देश में
पंडितों ने बांचा है नया फलादेश
तीज-करवा के चांद का मुंह है टेढ़ा
यह सीधी समझ बहुत दूर निकल गई
बर्फ की तरह जमी
सदियों की प्रेम अनुभूति
आइसक्रीम की तरह पिघल रही
वफा से ज्यादा
अनुभव का घाटा-मुनाफा
बटोरने में हर्ज क्या है
जब बाजार ने कर ही रखा है घोषित
स्त्री को देह और प्रेम को
नए दौर का सबसे बड़ा संदेह

अब रोती-बिसूरती प्रेमिकाओं के सदाबहार गीत
आकाशवाणी बनकर नहीं फूटेंगे
नहीं टपकेगी रात
किसी वियोगिनी की आंख से
नहीं महकेगी सांस
किसी प्रिय की विदाई-आगमन से
बेवफा प्रेमिकाओं ने
वफादार प्रेमियों का मिथक तोड़ दिया है

Wednesday, July 27, 2011

अबीर हुई लड़की


(1)
प्यार
प्यार का पुनर्पाठ
अभिनय की तरह कई बार के रिटेक में
फाइनल शॉट का अभ्यास
एक जनतांतित्रक मसला तो है
पर संवैधानिक नहीं
सवाल उगाती समझदारी है यह
उस अधीर लड़की की
जो भूल से प्यार भले न सही
पर प्यार में चूक जरूर कबूलती है
प्यार का मर्म कोमल धर्म
उसे रह-रहकर कचोटता है
अपने ही किए को
कसौटी बनाने के जोखिम से

(2)
पिछले दरवाजे से स्वाधीन हुआ प्रेम
सामने के दरवाजे पर खड़ा
बड़ा सवाल है
वह लड़की आज भी अधीर है
बाल को संवारने जैसा
जिंदगी की संभाल के लिए

(3)
प्यार को रोक नहीं पाना
एहसास की सिहरन जागते ही
तकिया-रजाई हो जाना
महज समय के दोशाले में लिपटी
खरगोशी गरमाहट नहीं
समय के सबसे तेज साफ्टवेयर पर
डाउनलोड किया गया एप्लीकेशन भी है

(4)
...तो क्या एक अधीर लड़का ही
आखिरकार गढ़ता है
एक अधीर लड़की का प्रेम
उसका मन
उसका मिजाज
उसका पूर्व उसका आज
बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान
समय से ऊंची मचान
तीखे तीर शातिर कमान

(5)
अबला को
बला की संभावनाओं से भर देना
आजादी के नाम पर की गई
मालफंक्शनिंग नहीं तो और क्या है

(6)
लैंगिक समता के अलंबरदारों बताओ
एक लड़की का बेडरूम की तरह इस्तेमाल
उसे जिस हाल तक देता है पहुंचा 
वहां कितना बचता ही है दमखम
एक अधीर हुई
अबीर हुई लड़की के पास
कि वह फिर से करे प्यार
अपने किए-कराए पर पुनर्विचार
या कि आंखों को काजल कर देने वाले
आंसुओं पर एतबार

Friday, July 22, 2011

मर्दाना तर्क जनाना हाथों में

(1)
याद आता है
अभिनेता महान का हिट संवाद
मर्द को दर्द नहीं होता जनाब
गूंजती है आवाज
सनसनाहट से भरी एमएमएस क्लिप में
बांग्ला की कुलीन अभिनय परंपरा की बेटी की
आई वांट ए परफेक्ट गाइ  
और फिर उतरने लगते हैं पर्दे पर
एक के बाद एक दृश्य
शालिनी ने लकवाग्रस्त पति को
दिया त्याग रातोंरात
अधेड़ मंत्री के यहां पड़े छापे में मिली
पौरुष शास्त्र की मोटी किताब
वियाग्रे की गोलियां
मुस्टंड मर्दानगी के लिए ख्यात
हकीम लुकमान के लिखे अचूक नुस्खे
मिस वाडिया ने अपनी आत्मकथा में
उड़ाया इंच दर इंच मजाक
अपने सहकर्मी की गोपनीय अंगुली का

(2)
नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं
उन्हें नहीं मिलेगी तोशक न मिलेगी रजाई
न वे झूल सकेंगे झूला न बना सकेंगे रंगोली
और न खेल सकेंगे होली
अवैध मोहल्लों के किसी गली-कूचे या मैदान में
 ऊंची एड़ी पर खड़ी दुनिया
 नहीं देखना चाहती किसी नामर्द की शक्ल
अपनी किसी संतान में

(3)
मर्द न होना किसी मर्द के लिए 
बिल्कुल वैसा ही नहीं है
जैसा किसी औरत का न होना औरत
स्त्री-पुरुष का लिंग भेद मेडिकल रिपोर्ट नहीं
बीसमबीस क्रिकेट का स्कोर बोर्ड
करता है जाहिर
पुरुष इस खेल को सबसे तेज और
जोरदार खेलकर ही साबित हो सकते हैं जवां मर्द
और तभी मछली की तरह उतरेगी
उसके कमरे में कैद तलाब में कोई औरत

(4)
मर्दाना पगड़ी की कलगी खिलती रहे
अब ये चाहत नहीं चुनौती है पुरुषों के आगे
उसे हर समय दिखना होगा
सख्त और मुस्तैद
नहीं तो सुनना पड़ सकता है ताना
वंशी बजाते हुए नाभी में उतर जाने वाले कन्हाई
कहीं पीछे छूट गए
औरतों ने देना शुरू कर दिया है
पुरुष को पौरुष से भरपूर होने की सजा
जिस औजार से गढ़ी जाती थीं  
अब तक मन माफिक मूर्तियां
अब उनका इस्तेमाल मिस्त्री नहीं
बल्कि करने लगे हैं बुत
मैदान वही
बस  योद्धाओं के बदल गए हैं पाले
मर्दाना तर्क जनाना हाथों में
ज्यादा कारगर और उत्तेजक रणनीति है
जैसे को तैसा...
जनाना न्याय का उध्बोधन गीत है

Thursday, July 7, 2011

परपुरुष


कल जब तुम्हारी शर्ट की कालर पर
जमी देखी कीचट मैल तो मिचलाने लगा मन
लड़खड़ाते देखा किसी अव्वल बेवरे की तरह
तो घबड़ाने लगा मन
प्रेम मैं करती थी तुम्हीं से
किया था खुद से ही वरण तुम्हारा
पर फैसला यह शरमाने लगा
तुम्हारे नाम का पल्लू ओढ़ूं आजीवन
जीवन ऐसा गंवारा नहीं लगा
मेरी कोख से होगा पुनर्जन्म तुम्हारा
सोचकर दरकने लगी मेरे अस्तित्व की धरती
भर-भराकर कर गिरने लगा
सिंदूरी सपनों का आसमान

तुम्हारी गोद में ही ली मैंने
किसी परपुरुष के सपने का सुख पहला
देहगंध का संसर्ग बदलने की हिमाकत
विद्रोह की तरह था मेरे लिए
तुम्हारे साथ रखकर ही शुरू कर दी मैंने
किसी और के होने की प्रार्थना
मांगने लगी मनौती छुटकारे की
देह का धधकता दाह
जला दे रही था वह सब
जो तुम्हारे नाम से दौड़ा था कभी नसों में मेरी

बचाने की कोशिश तो की भरसक तुमने
संबंध की अनजाने ही ढीली पड़ती गांठ को
पर जतन के हर पासे को पलटता देख
खोने लगे संतुलन
पटकने लगे थाली
बरबराने लगे गाली
जिन बालों पर फेरकर हाथ तुमने दिया था कभी
अनंत प्यार का भरोसा
वह मेरी मुंहजोर बेवफाई का
बना पहला शिकार
नोचे बेरहमी से तुमने बाल मेरे
कभी पागल कर देने वाली गोलाई पर
टूटा तुम्हारे हाथ से रेत की तरह सरकते जाते
प्यार का भिंचभिंचाता गुस्सा

इस झंझावात का सामना करना
भले दुश्वार था मेरे लिए
बिलख उठती थी मैं
तुमसे बार-बार दागे जाने के बाद
पर यही तो था वह जंगल
जिसे चाहती थी मैं पहले उगाना
और बाद में खुद उसमें फंसना
फिर कर लेना चाहती थी इसे जैसे-तैसे पार

तुम नहीं मेरे प्यार
कर नहीं सकते तुम मुझे प्यार
इस सच को सधा होना ही नहीं
अंतिम होना भी जरूरी था
प्यार के रेशमी रिश्ते के टूटने का
लौह तर्क आखिरकार जीत गया
देखते-देखते ही देखते
तुम और तुम्हारा साथ बीत गया
और इस तरह एक दिन फूंक दिया मैंने
तुमसे मुक्ति का महामंत्र

तुम्हारे साथ होने की ठिठुरन
जिस रजाई को ओढ़कर करती रही दूर
जिसके सपनों के तकिए पर काढ़ती रही
सपनों के फूल
तुम्हें खोने का सुख
जिसके पास होकर देता रहा
गहरी लंबी सांस जैसा सुकून
प्यार वह सहारा जैसा था
सहारा वह भूख जैसी थी
भूख वह देह जैसी थी
और देह वह जलाता रहा
मेरी बिंदास चेतना का अलख
भरमाई आंखों से पूजती रही मैं
दीर्घ और विद्रोही इच्छाओं का महाकलश

सेल नंबर तुम्हारा


बदल गया है कितना कुछ
इस बीच
तब का देखा
देख रहा हूं आज
कितने सालों बाद
बदल गई हो कितनी तुम

नहीं लगती बिल्कुल पहले जैसी
न हैं आदतें वैसी
न बोलने-बतियाने का अंदाज वैसा
सपनों से मुंह चुराती अपनों से रीती बातें
गहनों कपड़ों रंगों को लेकर नजरिया
बालों को बांधने-खोलने के सलीके
कितने बदल गये हैं इस बीच

पर शायद सब कुछ इतना
बदल नहीं पाता
बदल न पाते हालात इतने
बदला न होता इस बीच
अगर सेल नंबर तुम्हारा

Tuesday, July 5, 2011

अवैध संबंध


संबंधों के क्रूरतम संकट के दौर में
सबसे बड़ा असंवैधानिक अनुबंध है
अवैध संबंध 

संविधान की प्रस्तावना
जिस देशकाल को रचने का
जताती है भरोसा
जिसके प्रति जतानी होती है
सबसे ज्यादा निष्ठा
उसके धुर्रे बिखेरकर
तैयार हो रहा है
रिश्तों का मन माफिक जंगल
घुप्प अंधेरे जैसा पसरा
अवैध समाज

अवैध संबंध
जिसकी व्याख्या न तो
अरस्तु के पुरखों
और न उनकी सीढ़ियों पर बैठी
संतानों ने की
पर रहे तो हैं ये तब भी
जब मर्यादा के सार्वकालिक
सुलेख रचे गए
महलों में बने हरम
कर्मकांडों की हांडी में
पकने वाला धरम
इतना नरम तो कभी नहीं रहा
कि उसकी गरमाहट
घर के दायरे में कैद हो
और किसी लक्ष्मण रेखा से
पहले तक ही वैध हो
इनके पुचकार और  प्रसार के
अगनित पड़ाव
महज मानवीय इतिहास नहीं
बल्कि उसे सिरहाने सुलाने वाले
मनुष्य की आंख-कान हैं

संवेदना, इच्छा और प्रेम की
गोपनीय संहिता की आपराधिक धाराएं
दिमाग से टपकती हैं
पर मन की भट्टी उड़ा देती है
इन्हें भाप बनाकर
भूला देती है सभ्यता का शाप मानकर
पुण्य की सियाही से लिखा पाप मानकर

अब भी जिन आंखों को चुभती हैं ये
अखरती हैं बिछावन में चुभे आलपीन की तरह
उन्हें बटन की तरह खुली
अपनी आंखों पर नहीं
उन पंखों पर
भरोसा करना चाहिए
जिनको खोलने की आदिम इच्छा
मरती तो कभी नहीं
हां, आत्महत्या जरूर कर लेती है कई बार
सिहरन से भी तेज उगने वाले डर से
कानून की काली नजर से

Thursday, June 30, 2011

हां मेरी संगिनी


पटरी पर
जब तक दौड़ती है रेल
बनी रहती है धड़कन 
जिंदगी की   
हां मेरी संगिनी
होकर तुम्हारे साथ
होता है यह एहसास 
कि पटरी के बिना रेल
और मैदान से बाहर
खेल का जारी रहना
यकीन नहीं
बस है एक मुगालता 
सुब कुछ ठीक होने का
अपनी ही लानत पर
निर्भीक होने का 

Monday, June 13, 2011

वह कविता के पास आएगी


मेरी कविता के पास खड़ी वह लड़की
मेरी कविता से मेरे अनजाने क्या बतियाती है
कुछ गुलबूटे उसके सिलबटी आंचल के
खिलखिलाने लगे हैं मेरी कविता की शाखों पर
कई साल बाद लिख रहा हूं फिर एक कविता
वह उसी तरह आकर खड़ी है
थोड़ी थकी उदास मेरी कविता के पास

उसके होने का दखल मेरी कविता में कब-कहां बदलता है
यह मैं ही सोच रहा हूं कि कोई सोचने को कहता है
उसी की कामना लिखूं अपने अजन्मे शब्दों से
सोच के साथ शुरू होता है एक अंदरूनी समारोह
लेखनी की हरकत छवि का आरंभ
वेग-आवेश-सुरंग झील-समुद्र-आकाश
दौड़ती हुई धूप छिपती हुई छांह
पसीजता पसीना रेत की छाती से
दौड़ पड़ा मेमना अपनी ही हांक पर
हांफती हुई दहलीज उतरी हुई कमीज
अविराम यात्रा में सानंद कि हिचकी
पहले अर्धविराम फिर पूर्ण विराम

नहीं
मेरी इच्छा का मैल वह चाहकर भी नहीं धो पाएगी
वह ऐसे ही मेरी कविता के पास आएगी
बतियाएगी
मैं नहीं उतरूंगा अपनी कविता के जीने से
संबंधों का रिबन लेकर
ये गरिमा उजास पूर्णिमा
मैं नहीं लिख पाऊंगा
वह वहीं खह़ी होकर मेरी कविता से बड़ी हो जाएगी
मैं कविता लिखूंगा
वह कविता के पास आएगी