Showing posts with label बाजार. Show all posts
Showing posts with label बाजार. Show all posts

Monday, December 3, 2018

मोमबत्ती का यह उजाला


दूब-घास का हरा मटमैला संसार
गांव-गंवई का देशज विस्तार
एक बिंदू को जबरन रेखा बना देना
अबीरी उल्लास का
सिंदूरी भार से दब जाना
एक सपनीली रात का गर्भपात
संस्कृति का अपनी ही बेटी के साथ
परंपरागत विश्वासघात है

अनुभव की यह दुहाई
पहले एक लड़की देती थी
अब एक औरत देती है
अपनी ही आंखों में
ओझल हुए सपनों को
चिड़ियों की तरह बुलाते हुए
भाषा की अंजुरी में अपने आंचल का
सबसे कीमती प्रसाद रखते हुए
मानवता की देहरी पर
अंतिम दीया बालते हुए

एक औरत में
एक लड़की की खोज पूरी करना
सिंदूर की लाली को
मलाल से भर देना नहीं
एक अहसास को
तर-बतर कर देना है
एक सुखी नदी को
फिर से सजल कर देना है
दिल को तार और
दिमाग को बुखार लिखने वाले
हैरान हो सकते हैं
साड़ी के कोर को
फ्रॉक का रिबन बनते देख

कौमार्य को धो देने
जवानी को खो देने के बाद भी
बची रह जाती है एक लड़की
संवेदना की किसी निर्जन बस्ती में
शब्दों के बगीचे में
किसी अनजान डाल पर
झूलते हुए झूला
भरती हुई किलकारी
लहराती हुई केश

अंगों के स्पर्श को
इच्छाओं के संघर्ष को
अनुभूति के द्वंद्व का नाम देकर
दुनिया चाहे लाख खेलती हो
शह-मात का खेल
पर 21वीं सदी के
दूसरे दशक की दस्तक बनी
आधी दुनिया ने
खेल के सारे नियम बदल दिए हैं
धोखे से प्यार चखने वाले
अब प्यार के नए
चोखे हथियार से हार रहे हैं
इश्किया मुहावरों की
अपनी थाती को
अपने ही हाथों सिधार रहे हैं

आज ऐसी ही एक लड़की ने
औरत के जिस्म से बाहर आकर
जलाई है मोमबत्ती
अपने नाम से
अपने जन्म लेने की
सालाना घोषणा करते हुए
मोमबत्ती का यह उजाला
हमारे समय के
सबसे घनघोर
अंधकार के खिलाफ है

Thursday, September 27, 2018

चेहरा




मैं तुम्हारे चेहरे पर हंस सकता हूं
मैं तुमसे पूछ सकता हूं
कि कोयले के खदान में क्या
कम पर गया था चट्टान
मैं कह सकता हूं कि तुम स्थगित कर दो
अपने चेहरे को अपने अस्तित्वबोध से

मैं तुम्हारे सामने नहीं खोल सकता
अपने महंगे कैमरे का लेंस
सौंदर्य को नरम के साथ
पोर्न मैगजीन को अपने बदन पर अोढ़ने वाले
कागज की तरह होना चाहिए मांसल
इश्तेहारों के दौर में
यह बयान सुलेख की तरह कंठस्थ है मुझे

मैं तुम्हारे चेहरे पर मलना चाहता हूं अवलेह
जिसे श्रम की भट्टियों की
महंगी राख से बनाया गया है
मैं बदल देना चाहता हूं तुम्हारा चेहरा
जैसे बाजार में बार्बीज
बदलती रहती है अपना लुक

मैं तुम्हारे चेहरे पर कविता लिखना चाहता हूं
पर कोई भी शब्द साथ देने को नहीं तैयार
संवेदना की विनम्र कोशिश
कैसे हाथ मलते रह जाती है
यह विवशता असहनीय है मेरे लिए
मैं इस असहनीयता से दूर निकलना चाहता हूं
रिहाई चाहता हूं मैं तुम्हारे चेहरे की बजती जंजीरों से 

तुम्हें लिखने की कोशिश में
कसीदे काढ़ने लग जाता हूं मैं
उन संगमरमरी पत्थरों के बने बूतों के
जिन्हें इतिहास के सबसे क्रूर राजाओं ने
नींद की गोली की तरह इस्तेमाल की गईं
लौंडियों के नाम पर बनवाए हैं

मैं तुम्हारे चेहरे को इस सदी से बाहर
पांच हजार साल की स्मृति से बाहर
फेंक देना चाहता हूं
नहीं है एेसे चेहरे की अब कोई गुंजाइश
बीत चुका है एेसे चेहरों का दौर
सरकार से लेकर संवाद और संवेदना
सबके डिजिटल हो जाने के बाद

चेहरे मतलब रंग होता है
चेहरा रौनक की बड़ी बहन है
काला या सांवला कोई रंग नहीं
अभिशाप है अभिशाप
चॉकलेट के रैपर से लेकर
भगवान की किताब तक
आज सब रंगीन हैं
सबके आवरण पर है
रौशनी का महोत्सव

मैं तुम्हें चेहरा कहना भी नहीं चाहता
तुम चेहरा हो भी नहीं सकती
तुम तो छाया हो बस
एक एेसी छाया
जो कभी मेरे सिर के ऊपर से
तो कभी पांव के बीच से गुजरी है
एक एेसी छाया
जो मन के धूप को रोक लेती है
खुद को और जलाने के लिए

तुम्हारे चेहरे पर मेरी आंखें मेरे सपने
दोनों मिलकर रोज गाते हैं शोकगीत
एक एेसा शोकगीत
जो चेहरे को सौंदर्य
और सौंदर्य को मांसल खरोंच से भर देने की यातना पर
अभिभूत न होने के दुख से जन्मा है

तुम्हारे चेहरे के कारण
आईनों ने झूठ बोलना सीख लिया है
इन आईनों ने ही तो सबक रटाया है औरत जात को
कि वह चेहरे को सिंदूर की सीध में नहीं
किसी पुरुष की रीढ़ में देखे
कि चेहरा सौंदर्य की डाल पर खिलने के लिए
नाखूनों में भरने के लिए होता है
संस्कृति और विकास का तेजाब मलने के लिए होता है

#रोप्रे
27.09.18


Saturday, September 22, 2018

शुष्कता अब शर्मनाक है



अच्छा है नभ बरस रहा है
बाहर-अंदर सब भींग रहा है
घोषित है हर ओर आद्रता
                पानी से मनमानी खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

सोचा था वो एेसे होंगे
सोचा था वो वैसे होंगे
सोचा उसकी सोच के बाबत
                सोच बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

पूरब को पुरबाई कह देना
वचन-वचन को गहराई
कुछ को कुछ लिख देना यूं ही
                आदत बहुत खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

कुछ शब्द लिफाफे के भीतर
कुछ बात दबे तकिए के नीचे
कुछ शब्द हो गए सहयात्री
                संवाद बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

#रोप्रे
22.09.18

Wednesday, September 5, 2018

सिमोन फिदा है



तेरे मीनार पर चढ़कर
तुम्हारी दीवार पर जाकर
कोई कुछ भी लिख दे
यह कोई लापरवाही नहीं
एक सुनियोजित
सुविचारित जनतंत्र है
जिस पर लिंकन तो दुखी
पर सिमोन फिदा है

अस्मिता का कलश
बौद्धिकों के हाथों में
सर्वाधिक असुरक्षित है
आधी दुनिया की इस पूरी समझ को
नारा या विरोधी तख्ती की दरकार नहीं
उसे संवेदना का लोकतंत्र
और लोकतंत्र की संवेदना
दोनों की संभाल आती है

इनबॉक्स के घुसपैठिए तो होते हैं
एकदम आवारा पूंजी की तरह
कहीं भी लग्गी से नापकर
अपने साम्राज्य का ग्लोब नचाने वाले
झूठ को शहद
और सच को संग्रहालय की चाबी थमाने वाले

प्यार कुंठा का नहीं
भीतरी तंदुरुस्ती का शास्त्र है
सिंदूर से पहले सपना
सिंदूर के बाद पक्षी विहार है
समझ का ये पानी नहीं समा सकता
यूं ही प्यार की पवित्रता बांट रहे
पंडों के कमंडल में

नारी सशक्तीकरण का नया दौर
लैंगिक समकोण का नया दृष्टिकोण
घर की रसोई में पकी नई रोटी
बेगम अख्तर की ठुमरी की
अपडेटेड फरमाइश है

05.09.18

Sunday, September 2, 2018

वायरल फीवर


दुनिया में पहला वायरल फीवर
गंदा पानी पीने
या कुछ भी ऐसा-वैसा खाने से नहीं हुआ होगा
मेडिकल साइंस को मान लेनी चाहिए यह बात
और बंद करना चाहिए
दुनिया के पहले रोग
पहले बुखार के खिलाफ प्रोपेगेंडा वार

वायरल फीवर की पहली
और आखिरी वजह एक है
और वह वजह सेब है
वह सेव जिसे कभी प्रेम का
तो कभी पाप का फल कहा गया
पर जैसा वह पहली बार चखा गया
वैसा फिर नहीं चखा गया

सेब अब अपने पेड़ों पर कम
बाजार में ज्यादा हैं
अब भी खाते हैं लोग उसे
पर नहीं खाता कोई सेब 
किसी अंतरंग प्रस्तावना से पहले
तर-बतर आस्था के साथ

मनुहारी चर्चा के बीच
 सेब की जगह अब शिलाजीत है
प्यार अब वायरल फीवर का नहीं
एक खुराक का नाम है

Friday, August 31, 2018

भाषा का न्यूटन


1.
भाषा के न्यूटन ने जब लिखा होगा
संधि विच्छेद का नियम
तब पैदा नहीं हुए होंगे चाणक्य
न ही होती होगी
राज्यों के बीच संधि
न होती होंगी शिखर वार्ताएं
न बनाता होगा कोई बढ़ई गोलमेज
तब बकरी की भाषा बोलने का
नहीं करता होगा कोई लोमड़ी रियाज
तब शरणार्थी
खैराती शामियाने के नीचे सिर छिपाने के लिए
नहीं करते होंगे फरियाद

2.
भाषा के न्यूटन ने
जब देखा होगा पहली बार दूरबीन से
भाषा में समास को
तब नहीं बने होंगे ब्रांड
न करती होंगी लड़कियां कैटवॉक
नए लिंग निर्णय के साथ

3.
रेहड़ी-पटरी पर बैठा प्रत्यय
आज जुमलों की अट्टालिकाएं देखकर
भाषा के न्यूटन को कोसता है
भाषा भी एक कूटनीति है
रात को अपनी रोटी
पत्नी की थाली में रखकर सोचता है
01.09.18

इनबॉक्स




पोस्टबॉक्स में रखा पोस्टकार्ड

इनबॉक्स में आकर हैरान है

यहां संवेदना बस सूचना

और सूचना एक युद्धक विमान है

01.09.18


Thursday, June 23, 2016

'फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है’

-प्रेम प्रकाश
केरल में अपनी सरकार बनाने की खुशी को बड़ी कामयाबी के तौर पर जाहिर करते हुए माकपा ने अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के रंगीन विज्ञापन दिए। इससे पहले इस तरह का आत्मप्रचार वामदलों की तरफ से शायद ही देखने को मिला हो। दरअसल, पिछले दो दशकों में और उसमें भी हालिया दो सालों में सियासी तौर पर उनका रास्ता जिस तरह तंग और उनकी काबिज जमीन का रकबा इकहरा होता जा रहा है, उसमें यह अस्तित्व बचाने का आखिरी दांव जैसा है। वाम जमात ने इतिहास से लेकर साहित्य तक जिस तरह अपने वर्चस्व को भारत में दशकों तक बनाए रखा, वह दौर अब हांफने लगा है। खासतौर पर हिदी आलोचना में नया समय उस गुंजाइश को लेकर आया है, जब मार्क्सवादी दृष्टि पर सवाल उठाते हुए साहित्येहास पर नए सिरे से विचार हो। असहिष्णुता पर बहस और विरोध के दौरान यह खुलकर सामने आया था कि सत्तापीठ से उपकृत होने वाले कैसे अब तक अभिव्यक्ति और चेतना के जनवादी तकाजों को सिर पर लेकर घूम रहे थे। नक्सलवाद तक को कविता का तेवर और प्रासंगिक मिजाज ठहराने वालों ने देश में उस धारा और चेतना का रचनात्मक अभिव्यक्ति को कैसे दरकिनार और अनसुना किया, उसकी तारीखी मिसाल है जयप्रकाश आंदोलन। इस आंदोलन को लेकर वाम शिविर शुरू से शंकालु और दुविधाग्रस्त रहा। यहां तक कि लोकतंत्र के हिफाजत में सड़कों पर उतरने के जोखिम के बजाय उनकी तरफ से आपातकाल के समर्थन तक का पाप हुआ। 
अब जबकि वाम शिविर की प्रगतिशीलता अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद- ब-खुद अंतिम ढलान पर है तो हमें एक खुली और धुली दृष्टि से इतिहास के उन पन्नों पर नजर दौड़ानी चाहिए, जिस पर अब तक वाम पूर्वाग्रह की धूल जमती रही है। जयप्रकाश नारायण 74 आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील
युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है’ रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि 'आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरुजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्बार पर आई है।’ दरअसल जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। कह सकते हैं कि यह उस जेपी की क्रांतिकारी समझ थी जो मार्क्स और गांधी-विनोबा के रास्ते 74 की समर भूमि तक पहुंचे थे। दिलचस्प है कि सांतवें और आठवें दशक की हिन्दी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूस किए जाते हैं। अकविता से नयी कविता की तक की हिन्दी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिन्दी आलोचना के लाल साफाधारियों ने देश में 'दूसरी आजादी की लड़ाई’ की गोद में रची गई उस काव्य रचनात्मकता के मुद्दे पर जान-बुझकर चुप्पी अखितियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिन्दी ब्लकि विश्व की दूसरी भाषा के इतिहास में भी यह एक अनूठा अध्याय, एक अप्रतिम प्रयोग था। 
जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह 'समर शेष है’ की प्रस्तावना में प्रख्यात आलोचक डा. रघुवंश कहते भी हैं, 'मैं नयी कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं क्योंकि तमाम पिछले नये कवियों के साथ रहा हूं, परंतु उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु 'समर शेष है’ के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नयी भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नयी चुनौती है।’ कागज पर मूर्तन और अमूर्तन के खेल को अभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले वाम आलोचक अगर इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं तो इसे हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए एक दुर्भाग्यपूणã स्थिति ही कहेंगे। मौन कैसे मुखरता से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है।यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। 'हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मियों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ 'रेणु’ का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को 'रेणु समय’ तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक सामान्य अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, 'अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’ बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की 'खेल भाई खेल/सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल’, सत्यनारायण की 'जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन’, गोपीवल्लभ सहाय की 'जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल', रवींद्र राजहंस की 'सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी।’ 
कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाचकर गाते- 'इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को...।’ दिलचस्प है कि चौहत्तर आंदोलन में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकलकर सामने आईं। जयप्रकाश अमृतकोष द्बारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ 'जयप्रकाश’ में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के 'जयप्रकाश का बिगूल बजा’ के अलावा 'हम तरुण हैं हिद के/ हम खेलते अंगार से’ (डा. लल्लन), 'आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है’ (राज इंकलाब), 'युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है’ (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं।
हिन्दी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था। आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त 'मोहभंग की कविताओं’ या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी अंकन ढूंढ़े नहीं मिलता है जहां तात्कालिक स्थितयों कोे लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दें तो उक्त नंगी सचाई से मंुह ढापने के लिए शायद ही कुछ मिले। अलबत्ता यह भी कम दिलचस्प नहीं हैकि तब मुख्यधारा से अलग हिन्दी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना को स्वर दिया। मंच पर तालियों के बीच नीरज ने साहस से गाया- 'संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से।’ कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येतिहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो तो निष्कर्ष आंख खोलने वाले साबित हो सकते हैं। एक बार फिर डा. रघुवंश के शब्दों की मदद लें तो जयप्रकाश आंदोलन के 'कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अगर अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर परविसर्जित-प्रतिष्ठित किया।’ 

Monday, November 3, 2014

पूरबिया बरत

पनघट-पनघट
पूरबिया बरत
बहुत दूर तक
दे गई आहट
शहरों ने तलाशी
नदी अपनी
तलाबों-पोखरों ने भरी
पुनर्जन्म की किलकारी
गाया रहीम ने फिर
दोहा अपना
ऐतिहासिक धोखा है
पानी के पूर्वजों को भूलना
***
पानी पर
तैरते किरणों का दूर जाना
और तड़के
ठेकुआ खाने
रथ के साथ दौड़ पड़ना
भक्ति का सबसे बड़ा
रोमांटिक यथार्थ है
आलते के पांव नाची भावना
ईमेल के दौर में
ईश्वर से संवाद है
मुट्ठी में अच्छत लेकर
मंत्र तुम भी फूंक दो
पश्चिम में डूबे सूरज की
पूरब में कुंडी खोल दो
***
डाला-दौरा
सूप-सूपती
फल-फूल
पान-प्रसाद
मौली बंधे हाथों से
पूरा होता विधान
पुरोहित कोई
न कर्मकांड
लोक की गोद में
खेली परंपरा
पीढ़ियों की सीढ़ी पर
गाती रेघाती है
बोलता है नाचते हुए
जब भी कोई गांव
वह पांव बन जाती है

Tuesday, June 10, 2014

बैंक में जमा पेड़

कॉलोनी का सातवां
और उसके आहाते का
आखिरी पेड़ था
जमा कर आया जिसे वह
अजन्मे पत्तों के साथ बैंक में
इससे पहले
बेसन मलती बरामदे की धूप
आलते के पांव नाचती सुबह
बजती रंगोलियां
रहन रखकर खरीदा था उसने
हुंडरु का वाटरफॉल

निवेश युग के सबसे व्यस्त चौराहे पर
गूंजेंगी जब उसके नाम की किलकारी
समय के सबसे खनकते बोल
थर-थराएंगे जब
पुश्तैनी पतलून का जिप चढ़ाते हुए
खड़ी होगी जब नई सीढ़ी
पुरानी छत से छूने आसमान
तब होगी उसके हाथों में
दुनिया के सबसे महकते
फूलों की नाममाला
फलों की वंशावली
पेड़ों के कंधों पर झूलता
भरत का नाट्यशास्त्र

बांचेगा वह कानों को छूकर
सन्न से गुजर जाने वाली
हवाओं के रोमांचक यात्रा अनुभव
आंखों के चरने के लिए होगा
एक भरा-पूरा एलबम
तितलियों के इशारों पर
डोलते-गाते मंजर
मिट्टी सोखती
पानी की आवाज बजेगी
उसके फोन के जागरण के साथ

पर वे पेड़
जहां झूलते हैं उसके सपने
वे आम-अमरूद और जामुन
चखती जिसे तोतों की पहली मौसमी पांत
वह आकाश
जहां पढ़ती हैं अंगुलियां अपने प्यार का नाम
वह छाया
जिसे बगीचे चुराते धूप से
वह धूल
जहां सनती गात बांके मुरारी की
कहां होंगे
किन पन्नों पर होगी
इनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट
हारमोनियम से बजते रोम-रोम
किस बारहमासे से बांधेंगे युगलबंदी
आएंगे पाहुन कल भोर भिनसारे
कौवे किस मुंडेर पर गाएंगे
हमें देखकर कौन रोएगा
हम किसे देखकर गाएंगे

Sunday, April 22, 2012

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो...!


आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई  और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं है। दरअसल, चोरी एक ऐसी कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतने व्यापक हों उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क  यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर एक आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गया है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है। जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी।  
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। अपने यहां बोलचाल और पढ़ाई-लिखाई में हम हिंदी का तो इस्तेमाल करते ही हैं अंग्रेजी का भी जोर तेजी से बढ़ा है। एक खिचड़ी भाषा मोबाइल इंटरनेट की देसी भाषा बनकर इस दौरान उभरी है जिसे हिंग्रेजी कहा जा रहा है।
अब जरा इन शब्दों की नई बनती दुनिया को देखें। 'उदार' शब्द हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता रहा है। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया। दिलचस्प है कि 'उदारवाद' के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है। 
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन नहीं। शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
न्यू क्रिटिसिज्म में शब्दों को 'टेक्स्ट' की तरह देखने की दरकार रखी गई हैं। यानी शब्दों की यात्रा अर्थ तक जाकर समाप्त नहीं हो जाती बल्कि समय और संदर्भ के तमाम हवालों को वह अपने से जोड़ता है। पर दुर्भाग्य से शब्दों की हमारी दुनिया आज उन चोरों के हाथों चली गई है, जिनकी हैसियत कस्बाई या क्षेत्रीय नहीं बल्कि ग्लोबल है। ग्लोबल चोरी को मान्यता सरकारों ने तो दी ही है, हमारा समय और समाज भी इस तरह की चोरी पर खामोश तो क्या उसका हिमायती बन गया है।

Monday, January 9, 2012

वीरांगनाओं की युद्धनीति


कूल्हों के झटकों पर
मौसम नहीं बदलते
शेयर दलालों की बांछें भले खिल जाएं
उघड़ी टांगों पर तैरती फिसलन
या तो बरसाती है
या सोची-समझी शरारत

पेज थ्री की जंघाओं में
मचलती जिन मछलियों ने
ड्राइंग रूम के लिए
कराया है इक्वेरियम का अविष्कार
समझ लेना होगा उन्हें
कि रैंप पर चलने वालों को
पहाड़ पर चढ़ना मना है

रेन डांस में लहराती गोपिकाओं से
जबरिया छीन लिया गया है
मटका भरने का हुनर
न्योन लाइट से सजे इश्तेहार
बस नीले हो सकते हैं
या हो सकते हैं खतरनाक लाल
पाबंदी है इनके सिंदूरी होने पर

रंग-बिरंगी लट्टुओं में नहायी दुनिया के
सबसे ताकतवर मदारी का डमरू
तांडवी हो जाता है
उम्रदराज झुर्रियों को देखकर
लंबी छरहरी गुस्ताखियों के लिए
शहर के हाशिये पर बना ओल्डएज होम
नया रिलिजियस स्पॉट है
कच्चे सूत से पक्की गांठ बांधने वाला
पंडित भी फूंक नहीं पा रहा कोई मंत्र
जिससे दुनिया के सारे फोटोग्राफरों के
निगेटिव एक साथ धुल जाएं

अलबत्ता सवाल यह भी है कि
अब तक आंगन लीप रही औरतों
कोहबर सजा रही लड़कियों की दुनिया
किस छाते में खड़ी है
किन जंघाओं में खेलती हैं ये
सपनों के किन बगीचों में मिल जाती हैं
नीम कौडि़यां इन्हे आज भी

नया भूगोल ढूंढ़ रहे वास्कोडिगामा
है कमीज तुम्हारे पास
जिसे पहन तुम
नया सबेरा आंज रही
इन ललनाओं से मिल सको
खतरा है इतिहास लिख रहे
नये मिस्त्रियों के औजार
कहीं लूल्हे साबित न हों
सुंदर पति पाने के लिए
अब भी सोमवारी करतीं
वीरांगनाओं की युद्धनीति समझने में 

Monday, October 31, 2011

पूरबिया बरत


(1)
पनघट-पनघट
पूरबिया बरत
बहुत दूर तक
दे गयी आहट
शहरों ने तलाशी नदी अपनी
तलाबों पोखरों ने भरी
पुनर्जन्म की किलकारी
गाया रहीम ने फिर
दोहा अपना
ऐतिहासिक धोखा है
पानी के पूर्वजों को भूलना

(2)
पानी पर तैरते किरणों का दूर जाना
और तड़के ठेकुआ खाने
रथ के साथ दौड़ पड़ना
भक्ति का सबसे बड़ा
रोमांटिक यथार्थ है
आलते के पांव नाची भावना
ईमेल के दौर में ईश्वर से संवाद है
मुट्ठी में अच्छत लेकर
मंत्र तुम भी फूंक दो
पश्चिम में डूबे सूरज की
पूरब में कुंडी खोल दो

(3)
डाला दौरा सूप सूपती
फल फूल पान प्रसाद
मौली बंधे हाथों से
पूरा होता विधान
पुरोहित कोई न कर्मकांड
लोक की गोद में खेली परंपरा
पीढ़ियों की सीढ़ी पर
गाती रेघाती है
बोलता है नाचते हुए
जब भी कोई गांव
वह पांव बन जाती है

Saturday, October 15, 2011

अगुआ हो गया अच्छा गांव


ठंडा पानी मीठा पांव
रुठे पांव दबाता गांव
पाहुन गीत सुनाता गांव
बीत चुका है रीता गांव

घुटता-पिसता रिसता गांव
चढ़ते-चढ़ते गिरता गांव
खड़े समय में झुकता गांव
तेज समय पर रुकता गांव

सपना टूटा टूटा गांव
हड्डी टूटी टूटा पांव
सब टूटे तो टूटा गांव
सब आगे बस छूटा गांव

कोलतार बीच कच्चा गांव
सबसे बूढ़ा बच्चा गांव
झूठ बोलता सच्चा गांव
अगुआ हो गया अच्छा गांव

पंचों का पेचीदा गांव
उलझन में संजीदा गांव
खाली गोरखधंधा गांव
नोच रहे सब अंधा गांव

अच्छा नहीं भूल जाना गांव
अच्छा नहीं याद आना गांव
अच्छा नहीं अब अच्छा गांव
अच्छा... फिर मिलते हैं...
अच्छा...अच्छा गांव 

Tuesday, September 13, 2011

निवेश युग के व्यस्त चौराहे पर


कॉलोनी का सातवां 
और उसके आहाते का  
आखिरी पेड़ था
जमा कर आया जिसे वह
अजन्मे पत्तों के साथ बैंक में
इससे पहले
बेसन मलती बरामदे की धूप
आलते के पांव नाचती सुबह
बजती रंगोलियां
रहन रखकर खरीदा था उसने
हुंडरु का वाटरफॉल

निवेश युग के सबसे व्यस्त चौराहे पर
गूंजेंगी जब उसके नाम की किलकारी
समय के सबसे खनकते बोल
थर-थराएंगे जब
पुश्तैनी पतलून का जिप चढ़ाते हुए
खड़ी होगी जब नयी सीढ़ी
पुरानी छत से छूने आसमान
तब होगी उसके हाथों में
दुनिया के सबसे महकते
फूलों की नाममाला
फलों की वंशावली
पेड़ों के कंधों पर झूलता
भरत का नाट्यशास्त्र

बांचेगा वह कानों को छूकर
सन्न से गुजर जाने वाली
हवाओं के रोमांचक यात्रा अनुभव
आंखों के चरने के लिए होगा
एक भरा-पूरा एलबम
तितलियों के इशारों पर
डोलते-गाते मंजर
मिट्टी सोखती
पानी की आवाज बजेगी
उसके फोन के जागरण के साथ

पर वे पेड़
जहां झूलते हैं उसके सपने
वे आम-अमरूद और जामुन
चखती जिसे तोतों की पहली मौसमी पांत
वह आकाश
जहां पढ़ती हैं अंगुलियां अपने प्यार का नाम
वह छाया
जिसे बगीचे चुराते धूप से
वह धूल
जहां सनती गात बांके मुरारी की
कहां होंगे

किन पन्नों पर होगी
इनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट
हारमोनियम से बजते रोम-रोम
किस बारहमासे से बांधेंगे युगलबंदी   
आएंगे पाहुन कल भोर भिनसारे
कौवे किस मुंडेर पर गाएंगे
हमें देखकर कौन रोएगा
हम किसे देखकर गाएंगे

Thursday, September 1, 2011

सदी की अंतिम कविता


सदी के आखिर में बंधते
लाखों-करोड़ों असबाबों के बीच
छूट गयी है वह
किसी पोंगी मान्यता की तरह
नहीं लेना चाहता कोई अपने साथ
नहीं चाहता होना कोई
नयी सदी में उसके पास

आने-जाने वाले हर रास्ते पर
चलते-फिरते हर शख्स को
जागो और चल पड़ो की
अहद दे रही हैं नयी रफ्तारें
सांझ के दीये की तरह कंपती-बलती
कर रही है इंतजार
अब भी वह किसी के लौटने का

इस सदी के सबसे उदास दोपहर में
मैं पहुंचना चाहता हूं उसके पास
अभी-अभी छोड़ आई है
उलटा निशान तीर का जो
उस चौराहे पर
शोर जहां सबसे ज्यादा है
भीड़ है 
रेंगती हैं अफवाहें
तरह-तरह की सांपों की तरह
सदी का सबसे बूढ़ा आदमी
वहां गुजरते समय के
आखिरी दरवाजे पर बैठा है
चमार के पेशे के साथ
पूरी आस्था और
जन्मजात सेवा शपथ की अंटी बांधे
चलते-फिरते धूल उड़ाते
चप्पल-जूतों की चरमराहट दुरुस्त करने
इस तारीखी मंजर के सामने
रुंधे गले की नि:शब्दता पूरी होती है
छलछला आये आंसूओं से
लिखता हूं पंक्ति अंतिम
सदी की अंतिम कविता की
यह इस सदी का अंतिम फ्लैश है   

Monday, August 8, 2011

वफादार प्रेमियों का टूटा मिथक


दढ़ियल पांडेय जी की प्रेमिका
चिकने बांके द्विवेदी की जांघ पर
कल दोपहर बेसुध मिली
खबर यह इतनी बड़ी कि
दंगों के दौरान पैदा होने वाली
सनसनी भी खोलने लगी
आंचल की पुरानी गांठ

ठाकुर साहब की पूर्व ब्याहता
खिड़की के रास्ते दाखिल होकर
आवारा कुमार के संग
एक ही तकिए पर भिगोती रही रात
झूलती रही झूला
कई सालों तक एक साथ
सचाई यह इतनी बड़ी कि
तथ्य से बड़े सच की तरह
करने लगे सब
मन मसोसकर स्वीकार

प्रेमिका का प्रेम ज्यादा बदला
प्रेमियों के नामों के मुकाबले
प्रेम के बहाने स्त्री अनुभूति का
नया प्रस्थान बिंदु
कितना सघन
कितना सिंधु
रिक्शे पर भाग-भागकर
पुराने प्रेम की गलियों को छोड़ना पीछे
बाइक उड़ा रहे प्रेमी के साथ भरना उड़ान
सपनों से भी आगे क्षितिज के भी पार
नए प्रेम पयर्टन का रोड मैप है
सफर की इस जल्दबाजी में
जो छूट गया पीछे
वह कुछ और नहीं
बस जेनरेशन गैप है

प्रेम एक अनुभव
एक अंतराल लगातार
और दूर तक बजता जलतरंग
एतराज सिर्फ उन्हें जिनके नाखूनों से
छूटने लगे मांसल एहसास
गन्ने के खेत को जो लोग
गुड़-चीनी बनते देखने के हैं आदी
उनके लिए प्रेम होता है
हमेशा रंगीन आख्यान
दांत कटे होठों से
अश्लील शर्बत का पान

प्रेमिकाएं अब बांदी नहीं
पुरुष एहसास के जंगलों को मनमाफिक
झकझोर देनेवाली आंधी हैं
शर्मिंदगी का ऐनक चमकाकर
नहीं मिटाया जा सकता
उनकी आंखों के तीखेपन को
काढ़ने वाला काजल

प्रेम का रंग सिंदूरी नहीं अबीरी है
सौभाग्यवतियों के देश में
पंडितों ने बांचा है नया फलादेश
तीज-करवा के चांद का मुंह है टेढ़ा
यह सीधी समझ बहुत दूर निकल गई
बर्फ की तरह जमी
सदियों की प्रेम अनुभूति
आइसक्रीम की तरह पिघल रही
वफा से ज्यादा
अनुभव का घाटा-मुनाफा
बटोरने में हर्ज क्या है
जब बाजार ने कर ही रखा है घोषित
स्त्री को देह और प्रेम को
नए दौर का सबसे बड़ा संदेह

अब रोती-बिसूरती प्रेमिकाओं के सदाबहार गीत
आकाशवाणी बनकर नहीं फूटेंगे
नहीं टपकेगी रात
किसी वियोगिनी की आंख से
नहीं महकेगी सांस
किसी प्रिय की विदाई-आगमन से
बेवफा प्रेमिकाओं ने
वफादार प्रेमियों का मिथक तोड़ दिया है

Wednesday, August 3, 2011

कलपुर्जे


नल की चाबी
कुछ नहीं करती इशारा
आदत हो गयी है उसे
अब बेइशारा
बगैर शोरगुल के रहने की
फिर टपकती रहे बूंद
या बहती रहे मोटी धार
फर्क तो उसे तब भी न पड़े शायद
जब नदारद दिखे वह
बिगड़ जाये
या बेच दे कोई कबाड़ में
कलपुर्जे ऐसे कितने ही हैं आज
हमारे आसपास
जिनके इशारे कभी
गांधीजी की लाठी से भी तेज चलते थे
जिनके इशारे
किताबों के सौ-हजार पन्नों को
कभी भी फड़फड़ा देने को
रहते थे तत्पर
चाबी आंदोलन के
कितने निकम्मे हो गये हैं
हमारे समय के

Friday, July 22, 2011

मर्दाना तर्क जनाना हाथों में

(1)
याद आता है
अभिनेता महान का हिट संवाद
मर्द को दर्द नहीं होता जनाब
गूंजती है आवाज
सनसनाहट से भरी एमएमएस क्लिप में
बांग्ला की कुलीन अभिनय परंपरा की बेटी की
आई वांट ए परफेक्ट गाइ  
और फिर उतरने लगते हैं पर्दे पर
एक के बाद एक दृश्य
शालिनी ने लकवाग्रस्त पति को
दिया त्याग रातोंरात
अधेड़ मंत्री के यहां पड़े छापे में मिली
पौरुष शास्त्र की मोटी किताब
वियाग्रे की गोलियां
मुस्टंड मर्दानगी के लिए ख्यात
हकीम लुकमान के लिखे अचूक नुस्खे
मिस वाडिया ने अपनी आत्मकथा में
उड़ाया इंच दर इंच मजाक
अपने सहकर्मी की गोपनीय अंगुली का

(2)
नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं
उन्हें नहीं मिलेगी तोशक न मिलेगी रजाई
न वे झूल सकेंगे झूला न बना सकेंगे रंगोली
और न खेल सकेंगे होली
अवैध मोहल्लों के किसी गली-कूचे या मैदान में
 ऊंची एड़ी पर खड़ी दुनिया
 नहीं देखना चाहती किसी नामर्द की शक्ल
अपनी किसी संतान में

(3)
मर्द न होना किसी मर्द के लिए 
बिल्कुल वैसा ही नहीं है
जैसा किसी औरत का न होना औरत
स्त्री-पुरुष का लिंग भेद मेडिकल रिपोर्ट नहीं
बीसमबीस क्रिकेट का स्कोर बोर्ड
करता है जाहिर
पुरुष इस खेल को सबसे तेज और
जोरदार खेलकर ही साबित हो सकते हैं जवां मर्द
और तभी मछली की तरह उतरेगी
उसके कमरे में कैद तलाब में कोई औरत

(4)
मर्दाना पगड़ी की कलगी खिलती रहे
अब ये चाहत नहीं चुनौती है पुरुषों के आगे
उसे हर समय दिखना होगा
सख्त और मुस्तैद
नहीं तो सुनना पड़ सकता है ताना
वंशी बजाते हुए नाभी में उतर जाने वाले कन्हाई
कहीं पीछे छूट गए
औरतों ने देना शुरू कर दिया है
पुरुष को पौरुष से भरपूर होने की सजा
जिस औजार से गढ़ी जाती थीं  
अब तक मन माफिक मूर्तियां
अब उनका इस्तेमाल मिस्त्री नहीं
बल्कि करने लगे हैं बुत
मैदान वही
बस  योद्धाओं के बदल गए हैं पाले
मर्दाना तर्क जनाना हाथों में
ज्यादा कारगर और उत्तेजक रणनीति है
जैसे को तैसा...
जनाना न्याय का उध्बोधन गीत है

Thursday, July 14, 2011

गुलदस्तों का भार उठाना


अलंकरण समारोहों में
गुलदस्तों का भार उठाना
कितनी बड़ी कृतज्ञता है
विनम्रता है कितनी बड़ी
अपने समय के प्रति

हमारे समय के सुलेखों
पुस्तकालय के ताखों पर रखे
अग्रलेखों ने
लेख से ज्यादा बदली है लिखावट
उतनी ही जितनी
उनकी बातें सुनकर
महसूस होता है
श्रोताओं की पहली
और अंतिम कतार को

ऐतिहासिक होने का उद्यम
श्रीमान होने के करतब का
सबसे खतरनाक पक्ष है
समय की धूल पोंछकर
हाथ गंदा करने का जमाना लद गया
अब तो समय को सबसे क्रूरता से
बांचने वालों की सुनवाई है

कलम ने कुदाल की तौहीनी
भले न की हो
पर खुद को मटमैला होने से
भरसक बचाया है
हम जिन बातों पर रो सकते थे
सिर फोड़ सकते थे आपस में
कैसा तिलस्मी असर है इनका
कि हम बेवजह हंस रहे हैं
रो रहे हैं
जबकि हमें भी मालूम है
कि हम पूर्वजन्म से लेकर
पुनर्जन्म तक जागे ही नहीं
बस सो रहे हैं

मंचासीन जादूगरों के डमरू पर
डम-डम-डिगा-डिगा गाने वाले
जादू का खेल देखकर ताली बजाने वाले
अब मजमे में शामिल तमाशबीन नहीं
एक पागल भीड़ है
जो घर-घर पहुंच चुकी है
अगर न बने हम भीड़
तो भीरु कहलाएंगे
और अगर हो गए भीड़ तो
मारे जाएंगे