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Monday, December 3, 2018

मोमबत्ती का यह उजाला


दूब-घास का हरा मटमैला संसार
गांव-गंवई का देशज विस्तार
एक बिंदू को जबरन रेखा बना देना
अबीरी उल्लास का
सिंदूरी भार से दब जाना
एक सपनीली रात का गर्भपात
संस्कृति का अपनी ही बेटी के साथ
परंपरागत विश्वासघात है

अनुभव की यह दुहाई
पहले एक लड़की देती थी
अब एक औरत देती है
अपनी ही आंखों में
ओझल हुए सपनों को
चिड़ियों की तरह बुलाते हुए
भाषा की अंजुरी में अपने आंचल का
सबसे कीमती प्रसाद रखते हुए
मानवता की देहरी पर
अंतिम दीया बालते हुए

एक औरत में
एक लड़की की खोज पूरी करना
सिंदूर की लाली को
मलाल से भर देना नहीं
एक अहसास को
तर-बतर कर देना है
एक सुखी नदी को
फिर से सजल कर देना है
दिल को तार और
दिमाग को बुखार लिखने वाले
हैरान हो सकते हैं
साड़ी के कोर को
फ्रॉक का रिबन बनते देख

कौमार्य को धो देने
जवानी को खो देने के बाद भी
बची रह जाती है एक लड़की
संवेदना की किसी निर्जन बस्ती में
शब्दों के बगीचे में
किसी अनजान डाल पर
झूलते हुए झूला
भरती हुई किलकारी
लहराती हुई केश

अंगों के स्पर्श को
इच्छाओं के संघर्ष को
अनुभूति के द्वंद्व का नाम देकर
दुनिया चाहे लाख खेलती हो
शह-मात का खेल
पर 21वीं सदी के
दूसरे दशक की दस्तक बनी
आधी दुनिया ने
खेल के सारे नियम बदल दिए हैं
धोखे से प्यार चखने वाले
अब प्यार के नए
चोखे हथियार से हार रहे हैं
इश्किया मुहावरों की
अपनी थाती को
अपने ही हाथों सिधार रहे हैं

आज ऐसी ही एक लड़की ने
औरत के जिस्म से बाहर आकर
जलाई है मोमबत्ती
अपने नाम से
अपने जन्म लेने की
सालाना घोषणा करते हुए
मोमबत्ती का यह उजाला
हमारे समय के
सबसे घनघोर
अंधकार के खिलाफ है

Thursday, September 27, 2018

चेहरा




मैं तुम्हारे चेहरे पर हंस सकता हूं
मैं तुमसे पूछ सकता हूं
कि कोयले के खदान में क्या
कम पर गया था चट्टान
मैं कह सकता हूं कि तुम स्थगित कर दो
अपने चेहरे को अपने अस्तित्वबोध से

मैं तुम्हारे सामने नहीं खोल सकता
अपने महंगे कैमरे का लेंस
सौंदर्य को नरम के साथ
पोर्न मैगजीन को अपने बदन पर अोढ़ने वाले
कागज की तरह होना चाहिए मांसल
इश्तेहारों के दौर में
यह बयान सुलेख की तरह कंठस्थ है मुझे

मैं तुम्हारे चेहरे पर मलना चाहता हूं अवलेह
जिसे श्रम की भट्टियों की
महंगी राख से बनाया गया है
मैं बदल देना चाहता हूं तुम्हारा चेहरा
जैसे बाजार में बार्बीज
बदलती रहती है अपना लुक

मैं तुम्हारे चेहरे पर कविता लिखना चाहता हूं
पर कोई भी शब्द साथ देने को नहीं तैयार
संवेदना की विनम्र कोशिश
कैसे हाथ मलते रह जाती है
यह विवशता असहनीय है मेरे लिए
मैं इस असहनीयता से दूर निकलना चाहता हूं
रिहाई चाहता हूं मैं तुम्हारे चेहरे की बजती जंजीरों से 

तुम्हें लिखने की कोशिश में
कसीदे काढ़ने लग जाता हूं मैं
उन संगमरमरी पत्थरों के बने बूतों के
जिन्हें इतिहास के सबसे क्रूर राजाओं ने
नींद की गोली की तरह इस्तेमाल की गईं
लौंडियों के नाम पर बनवाए हैं

मैं तुम्हारे चेहरे को इस सदी से बाहर
पांच हजार साल की स्मृति से बाहर
फेंक देना चाहता हूं
नहीं है एेसे चेहरे की अब कोई गुंजाइश
बीत चुका है एेसे चेहरों का दौर
सरकार से लेकर संवाद और संवेदना
सबके डिजिटल हो जाने के बाद

चेहरे मतलब रंग होता है
चेहरा रौनक की बड़ी बहन है
काला या सांवला कोई रंग नहीं
अभिशाप है अभिशाप
चॉकलेट के रैपर से लेकर
भगवान की किताब तक
आज सब रंगीन हैं
सबके आवरण पर है
रौशनी का महोत्सव

मैं तुम्हें चेहरा कहना भी नहीं चाहता
तुम चेहरा हो भी नहीं सकती
तुम तो छाया हो बस
एक एेसी छाया
जो कभी मेरे सिर के ऊपर से
तो कभी पांव के बीच से गुजरी है
एक एेसी छाया
जो मन के धूप को रोक लेती है
खुद को और जलाने के लिए

तुम्हारे चेहरे पर मेरी आंखें मेरे सपने
दोनों मिलकर रोज गाते हैं शोकगीत
एक एेसा शोकगीत
जो चेहरे को सौंदर्य
और सौंदर्य को मांसल खरोंच से भर देने की यातना पर
अभिभूत न होने के दुख से जन्मा है

तुम्हारे चेहरे के कारण
आईनों ने झूठ बोलना सीख लिया है
इन आईनों ने ही तो सबक रटाया है औरत जात को
कि वह चेहरे को सिंदूर की सीध में नहीं
किसी पुरुष की रीढ़ में देखे
कि चेहरा सौंदर्य की डाल पर खिलने के लिए
नाखूनों में भरने के लिए होता है
संस्कृति और विकास का तेजाब मलने के लिए होता है

#रोप्रे
27.09.18


Thursday, September 13, 2018

बोल


तू बोले तो
तिमिर तम घोर
तू बोले तो
भोरमभोर


कड़वे बोल
मीठे बोल
तू बोले तो
सब अनमोल


मेरी जिह्वा
मेरी वाणी
नहीं चाहिए
उनका मोल


13.09.18

Tuesday, September 11, 2018

अंग्रेेजी शिक्षिका


मेरी अंग्रेजी मेरे खिलाफ जा रही है
मुझे जो हिन्दी याद नहीं
वो अब याद आ रही है
मैं अंग्रेजी की लिखावट में
नहीं लिख सकती अपना गांव
यादों में तरोताजा सहेलियों की चुहल
शादी से पहले अलग बुलाकर कही 
भाभी की वो गुदगुदा देने वाली बात

हिन्दी वैसी है
जैसे मैं बांधती हूं अपने केश
एक ही हेयर बैंड को दोहरा-तिहरा कर
मेरी साड़ी भी मेरी हिन्दी की तरह है
साड़ी कोई हो मुझे सिंदूरी लगती है
जब भी देखा छूकर पहनकर

मैंने अंग्रेजी शौक से पढ़ी है
अच्छे अंक आए हैं इसमें
हिन्दी में बिंदी गलत नहीं लगनी चाहिए
स्कूल में यह सीख नाकाम रही
आज अपनी बेटी को दुलारते हुए
स्कूल की पोशाक पहनाते हुए
खूब आई याद
झूलते हलंत और बिंदी की बात

हिन्दी मुझे अपने छोटे से शहर के जंगल में
निर्भीक साइकल पर घूमने की हिम्मत देती है
जहां जानवर भी करते हैं हिन्दी में बात
जहां नो एंट्री जैसा कोई डरावना साइनबोर्ड नहीं
न ही किसी हाथ में एसिड की बोतल है

मैं अंग्रेजी की शिक्षिका हूं
साफ-सुथरी अंग्रेजी पर पूरे अंक देती हूं बच्चों को
पर मेरा स्त्री मन
मेरी सोच मेरा रहन
सब हिन्दी वर्णमाला है
इससे कीमती मेरे पास बहुत कुछ है
पर इससे जरूरी कुछ भी नहीं
क्योंकि अंग्रेजी में मुझे संझा-बाती नहीं आती
मैं नहीं गा सकती अंग्रेजी में आरती



11.09.18

दुविधा का समंदर


जिसे पाया नहीं
खोना उसका भी
कचोट देता है

जिसे गाया नहीं
उतरना उसका अधरों से
मन मसोस देता है

दोपहर सा मन
हर तरलता
सोख लेता है

दुविधा का समंदर
मांझी को हर बार
टोक देता है

सोच की
दुबली रेखा जो
अकेली ही गुजरती है

अकेले होने का खतरा
अच्छे-अच्छों को
दबोच लेता है

11.09.18

Wednesday, September 5, 2018

सिमोन फिदा है



तेरे मीनार पर चढ़कर
तुम्हारी दीवार पर जाकर
कोई कुछ भी लिख दे
यह कोई लापरवाही नहीं
एक सुनियोजित
सुविचारित जनतंत्र है
जिस पर लिंकन तो दुखी
पर सिमोन फिदा है

अस्मिता का कलश
बौद्धिकों के हाथों में
सर्वाधिक असुरक्षित है
आधी दुनिया की इस पूरी समझ को
नारा या विरोधी तख्ती की दरकार नहीं
उसे संवेदना का लोकतंत्र
और लोकतंत्र की संवेदना
दोनों की संभाल आती है

इनबॉक्स के घुसपैठिए तो होते हैं
एकदम आवारा पूंजी की तरह
कहीं भी लग्गी से नापकर
अपने साम्राज्य का ग्लोब नचाने वाले
झूठ को शहद
और सच को संग्रहालय की चाबी थमाने वाले

प्यार कुंठा का नहीं
भीतरी तंदुरुस्ती का शास्त्र है
सिंदूर से पहले सपना
सिंदूर के बाद पक्षी विहार है
समझ का ये पानी नहीं समा सकता
यूं ही प्यार की पवित्रता बांट रहे
पंडों के कमंडल में

नारी सशक्तीकरण का नया दौर
लैंगिक समकोण का नया दृष्टिकोण
घर की रसोई में पकी नई रोटी
बेगम अख्तर की ठुमरी की
अपडेटेड फरमाइश है

05.09.18

Monday, September 3, 2018

युगल अवतरण


ईश्वर के पहरे में
सोया है ताल
नीरवता का श्लेष
एकांत का रूपक नहीं
प्रकृति और आस्था का
युगल अवतरण
छवि और छाया का
मिलन बोध है

वृक्षों की छाया का
सघन पत्राचार
मंदिर की महिमा से
सीधे भगवान से
द्वैत के दर्शन का
अद्वैत बोध है

यहां आकर सूरज
बदलता है कपड़े
यहीं चांदनी
अपना धरती श्रृंगार है
यहीं आकर
उसने भिंगाया था मुझको
यहीं पर बसा
वो सजल याद है

03.09.18





Sunday, September 2, 2018

वायरल फीवर


दुनिया में पहला वायरल फीवर
गंदा पानी पीने
या कुछ भी ऐसा-वैसा खाने से नहीं हुआ होगा
मेडिकल साइंस को मान लेनी चाहिए यह बात
और बंद करना चाहिए
दुनिया के पहले रोग
पहले बुखार के खिलाफ प्रोपेगेंडा वार

वायरल फीवर की पहली
और आखिरी वजह एक है
और वह वजह सेब है
वह सेव जिसे कभी प्रेम का
तो कभी पाप का फल कहा गया
पर जैसा वह पहली बार चखा गया
वैसा फिर नहीं चखा गया

सेब अब अपने पेड़ों पर कम
बाजार में ज्यादा हैं
अब भी खाते हैं लोग उसे
पर नहीं खाता कोई सेब 
किसी अंतरंग प्रस्तावना से पहले
तर-बतर आस्था के साथ

मनुहारी चर्चा के बीच
 सेब की जगह अब शिलाजीत है
प्यार अब वायरल फीवर का नहीं
एक खुराक का नाम है

Saturday, September 1, 2018

मोहल्ले का नायक


गर्म धूप की सेंक से
पक रही हैं लड़कियां
मोहल्ले की लड़कियां
फरवरी के महीने में
बरामदे की कुर्सियों पर
छत पर बिछी चटाई पर
खुले लॉन में
ऊन के फंदों में
कस रही हैं लड़कियां
बैडमिंटन के कोर्ट में
शटल के पंखों से
उड़ रही हैं लड़कियां

लड़कों का क्रिकेट बॉल
उड़ा ला रहे हैं लड़कियों की बातें
नयी पकी खुशबू की सौगातें
नहीं कर पा रहे हैं यही काम
ऊपर उड़ रहे कई पतंग
प्रयास के बावजूद

सबको पता है कि
शाम से पहले तीन-साढ़े तीन बजे
इस वासंती मुहूर्त का नायक यहां नहीं है
वहां लड़कियों की बातों से भी
उसकी टोह मुश्किल है
बची कविता
तो वह भला यहां कैसे हो सकता है
वैसे यह कहना भी फिजूल है
यह जानने के बाद कि
वह धड़कनों का चित्रकार है
और इस साल वसंत के पास
उसी की कूची से धुला आईडेंटीटी कार्ड है

Friday, August 31, 2018

भाषा का न्यूटन


1.
भाषा के न्यूटन ने जब लिखा होगा
संधि विच्छेद का नियम
तब पैदा नहीं हुए होंगे चाणक्य
न ही होती होगी
राज्यों के बीच संधि
न होती होंगी शिखर वार्ताएं
न बनाता होगा कोई बढ़ई गोलमेज
तब बकरी की भाषा बोलने का
नहीं करता होगा कोई लोमड़ी रियाज
तब शरणार्थी
खैराती शामियाने के नीचे सिर छिपाने के लिए
नहीं करते होंगे फरियाद

2.
भाषा के न्यूटन ने
जब देखा होगा पहली बार दूरबीन से
भाषा में समास को
तब नहीं बने होंगे ब्रांड
न करती होंगी लड़कियां कैटवॉक
नए लिंग निर्णय के साथ

3.
रेहड़ी-पटरी पर बैठा प्रत्यय
आज जुमलों की अट्टालिकाएं देखकर
भाषा के न्यूटन को कोसता है
भाषा भी एक कूटनीति है
रात को अपनी रोटी
पत्नी की थाली में रखकर सोचता है
01.09.18

इनबॉक्स




पोस्टबॉक्स में रखा पोस्टकार्ड

इनबॉक्स में आकर हैरान है

यहां संवेदना बस सूचना

और सूचना एक युद्धक विमान है

01.09.18


लीन


आशा में क्षीण होना

आकांक्षा में निम्न होना

अपेक्षा में दीन होना

प्रेम में शून्य होना नहीं

संवेदना में लीन होना है

कविता में शालीन होना है

Thursday, June 23, 2016

'फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है’

-प्रेम प्रकाश
केरल में अपनी सरकार बनाने की खुशी को बड़ी कामयाबी के तौर पर जाहिर करते हुए माकपा ने अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के रंगीन विज्ञापन दिए। इससे पहले इस तरह का आत्मप्रचार वामदलों की तरफ से शायद ही देखने को मिला हो। दरअसल, पिछले दो दशकों में और उसमें भी हालिया दो सालों में सियासी तौर पर उनका रास्ता जिस तरह तंग और उनकी काबिज जमीन का रकबा इकहरा होता जा रहा है, उसमें यह अस्तित्व बचाने का आखिरी दांव जैसा है। वाम जमात ने इतिहास से लेकर साहित्य तक जिस तरह अपने वर्चस्व को भारत में दशकों तक बनाए रखा, वह दौर अब हांफने लगा है। खासतौर पर हिदी आलोचना में नया समय उस गुंजाइश को लेकर आया है, जब मार्क्सवादी दृष्टि पर सवाल उठाते हुए साहित्येहास पर नए सिरे से विचार हो। असहिष्णुता पर बहस और विरोध के दौरान यह खुलकर सामने आया था कि सत्तापीठ से उपकृत होने वाले कैसे अब तक अभिव्यक्ति और चेतना के जनवादी तकाजों को सिर पर लेकर घूम रहे थे। नक्सलवाद तक को कविता का तेवर और प्रासंगिक मिजाज ठहराने वालों ने देश में उस धारा और चेतना का रचनात्मक अभिव्यक्ति को कैसे दरकिनार और अनसुना किया, उसकी तारीखी मिसाल है जयप्रकाश आंदोलन। इस आंदोलन को लेकर वाम शिविर शुरू से शंकालु और दुविधाग्रस्त रहा। यहां तक कि लोकतंत्र के हिफाजत में सड़कों पर उतरने के जोखिम के बजाय उनकी तरफ से आपातकाल के समर्थन तक का पाप हुआ। 
अब जबकि वाम शिविर की प्रगतिशीलता अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद- ब-खुद अंतिम ढलान पर है तो हमें एक खुली और धुली दृष्टि से इतिहास के उन पन्नों पर नजर दौड़ानी चाहिए, जिस पर अब तक वाम पूर्वाग्रह की धूल जमती रही है। जयप्रकाश नारायण 74 आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील
युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है’ रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि 'आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरुजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्बार पर आई है।’ दरअसल जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। कह सकते हैं कि यह उस जेपी की क्रांतिकारी समझ थी जो मार्क्स और गांधी-विनोबा के रास्ते 74 की समर भूमि तक पहुंचे थे। दिलचस्प है कि सांतवें और आठवें दशक की हिन्दी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूस किए जाते हैं। अकविता से नयी कविता की तक की हिन्दी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिन्दी आलोचना के लाल साफाधारियों ने देश में 'दूसरी आजादी की लड़ाई’ की गोद में रची गई उस काव्य रचनात्मकता के मुद्दे पर जान-बुझकर चुप्पी अखितियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिन्दी ब्लकि विश्व की दूसरी भाषा के इतिहास में भी यह एक अनूठा अध्याय, एक अप्रतिम प्रयोग था। 
जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह 'समर शेष है’ की प्रस्तावना में प्रख्यात आलोचक डा. रघुवंश कहते भी हैं, 'मैं नयी कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं क्योंकि तमाम पिछले नये कवियों के साथ रहा हूं, परंतु उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु 'समर शेष है’ के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नयी भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नयी चुनौती है।’ कागज पर मूर्तन और अमूर्तन के खेल को अभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले वाम आलोचक अगर इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं तो इसे हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए एक दुर्भाग्यपूणã स्थिति ही कहेंगे। मौन कैसे मुखरता से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है।यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। 'हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मियों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ 'रेणु’ का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को 'रेणु समय’ तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक सामान्य अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, 'अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’ बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की 'खेल भाई खेल/सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल’, सत्यनारायण की 'जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन’, गोपीवल्लभ सहाय की 'जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल', रवींद्र राजहंस की 'सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी।’ 
कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाचकर गाते- 'इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को...।’ दिलचस्प है कि चौहत्तर आंदोलन में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकलकर सामने आईं। जयप्रकाश अमृतकोष द्बारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ 'जयप्रकाश’ में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के 'जयप्रकाश का बिगूल बजा’ के अलावा 'हम तरुण हैं हिद के/ हम खेलते अंगार से’ (डा. लल्लन), 'आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है’ (राज इंकलाब), 'युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है’ (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं।
हिन्दी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था। आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त 'मोहभंग की कविताओं’ या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी अंकन ढूंढ़े नहीं मिलता है जहां तात्कालिक स्थितयों कोे लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दें तो उक्त नंगी सचाई से मंुह ढापने के लिए शायद ही कुछ मिले। अलबत्ता यह भी कम दिलचस्प नहीं हैकि तब मुख्यधारा से अलग हिन्दी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना को स्वर दिया। मंच पर तालियों के बीच नीरज ने साहस से गाया- 'संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से।’ कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येतिहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो तो निष्कर्ष आंख खोलने वाले साबित हो सकते हैं। एक बार फिर डा. रघुवंश के शब्दों की मदद लें तो जयप्रकाश आंदोलन के 'कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अगर अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर परविसर्जित-प्रतिष्ठित किया।’ 

Monday, November 24, 2014

प्रतिभा की कलम से द्रौपदी


ज्ञानपीठ पुरस्कार को इस साल पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह अलग बात है कि इस साल 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई है, जो वरिष्ठ हिदी कवि केदारनाथ सिह को दिया गया है। वर्ष के हिसाब से केदारजी को यह सम्मान 2०13 के लिए दिया गया है।
अपनी अर्धशती लंबी इस यात्रा में भारतीय भाषाओं के इस सर्वोच्च और सर्वमान्य माने जाने वाले पुरस्कार को लेकर हर हलके में एक सम्मान का भाव रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण इसका कम विवादित रहना रहा है। पुरस्कारों के अवमूल्यन के दौर में यह उपलब्धि बड़ी बात है।
मुझे याद है कि 2०11 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई तो एक साथ मोबाइल फोन और ईमेल पर कई मैसेज आने लगे। इनमें ज्यादातर इस सूचना को साझा करने वाले थे कि इस बार ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडिèया कथाकार प्रतिभा राय।
ताज्जुब हुआ कि गूगल के सर्च इंजन पर एक हफ्ते के अंदर इतनी सारी सामग्री इकट्ठा हो गई कि जिन्होंने पहले प्रतिभा जी को नहीं पढ़ा था, वे भी इस बारे में कई रचनात्मक तथ्यों से अवगत होने लगे। हिदीप्रेमियों के फ़ेसबुक वाल पर प्रतिभा जी की नई-पुरानी तस्वीरें साझा होने लगीं। साथ में सबके अपने मूल्यांकन और टिप्पणियां। हिदी की कई पत्रिकाओं ने इस अवसर पर या तो अपने विशेषांक निकाले या फिर प्रतिभा राय की कहानियों को पुनर्पाठ के लिए पाठकों को प्रस्तुत किया। ईमानदारी से कहूं तो पुरस्कार की घोषणा के बाद ही मैंने भी प्रतिभा जी के बारे में काफी कुछ पढ़ा और जाना-समझा। खासतौर पर उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'द्रौपदी’
को लेकर।
प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडिèया से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी’। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य’ लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समकालीन जीवन के गठन और चिताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिबात्मक’ औजार से ज्यादा जरूरी है- 'कथात्मक हस्तक्षेप’। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए प्रतिभा राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी’ में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी’ उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद है।

Wednesday, September 17, 2014

सन्निधि संगोष्ठी


सन्निधि संगोष्ठी दिल्ली में होने वाली साहित्यक गतिविधियों का अब एक जरूरी पन्ना बनता जा रहा है। इसका सतत आयोजन एक उपलब्धि की तरह है। मेरे पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत की इस आयोजन को सफल और सतत बनाने में बड़ी भूमिका रही है। इस बारे में समय-समय पर उनसे बातचीत भी होती रही। यह मैं अपना दुर्भाग्य या पत्रकारीय पेशे की मजबूरी मानता हूं कि अब तक मैं इस गोष्ठी में शरीक नहीं हो सका।
इस बार 21 सितंबर को यह गोष्ठी होगी। मेरे लिए संतोष और खुशी की बात है इस बार मैं भी इसका हिस्सा बनने जा रहा हूं।
इस बार की गोष्ठी में की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र कर रहे हैं। 'सिनेमा और हिंदी’ विषय पर मुख्य वक्ता हैं विनोद भारद्बाज। मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं प्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. किरण पाठक और मुझ कलम घसीट को आयोजकों ने बुलाया है। 

Sunday, January 6, 2013

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

Sunday, April 22, 2012

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो...!


आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई  और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं है। दरअसल, चोरी एक ऐसी कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतने व्यापक हों उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क  यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर एक आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गया है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है। जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी।  
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। अपने यहां बोलचाल और पढ़ाई-लिखाई में हम हिंदी का तो इस्तेमाल करते ही हैं अंग्रेजी का भी जोर तेजी से बढ़ा है। एक खिचड़ी भाषा मोबाइल इंटरनेट की देसी भाषा बनकर इस दौरान उभरी है जिसे हिंग्रेजी कहा जा रहा है।
अब जरा इन शब्दों की नई बनती दुनिया को देखें। 'उदार' शब्द हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता रहा है। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया। दिलचस्प है कि 'उदारवाद' के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है। 
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन नहीं। शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
न्यू क्रिटिसिज्म में शब्दों को 'टेक्स्ट' की तरह देखने की दरकार रखी गई हैं। यानी शब्दों की यात्रा अर्थ तक जाकर समाप्त नहीं हो जाती बल्कि समय और संदर्भ के तमाम हवालों को वह अपने से जोड़ता है। पर दुर्भाग्य से शब्दों की हमारी दुनिया आज उन चोरों के हाथों चली गई है, जिनकी हैसियत कस्बाई या क्षेत्रीय नहीं बल्कि ग्लोबल है। ग्लोबल चोरी को मान्यता सरकारों ने तो दी ही है, हमारा समय और समाज भी इस तरह की चोरी पर खामोश तो क्या उसका हिमायती बन गया है।

Friday, August 26, 2011

जयप्रकाश आंदोलन और हिंदी कविता


जयप्रकाश नारायण 74 आंदोलन के दिनों में अक्सर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है' रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि 'आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरूजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है।' दरअसल जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। कह सकते हैं कि यह उस जेपी की क्रांतिकारी समझ थी जो मार्क्स और गांधी विनोबा के रास्ते 74 की समर भूमि तक पहुंचे थे।
दिलचस्प है कि सांतवें और आठवें दशक की हिन्दी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूसकिए जाते हैं। अकविता से नयी कविता की तक की हिन्दी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिन्दी आलोचना के लाल-पीले साफाधारियों ने देश में 'दूसरी आजादी की लड़ाई' की गोद में रची गई उस काव्य रचनात्मकता के मुद्दे पर जान-बुझकर चुप्पी अख्तियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिन्दी ब्लकि विश्व की दूसरी भाषा के इतिहास में यह एक अनूठा अध्याय, एक अप्रतिम प्रयोग था।
जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह 'समर शेष है' की प्रस्तावना में आलोचक डा. रघुवंश कहते भी हैं, "मैं नयी कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं क्योंकि तमाम पिछले नये कवियों के साथ रहा हूं, परंतु उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु 'समर शेष है' के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नयी भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नयी चुनौती है।' कागजों पर मूर्तन और अमूर्तन के खेल को अभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले आलोचक अगर तीन दशक बाद भी इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं तो इसे हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कहेंगे। क्योंकि यह बिड़ला अवसर ही था जब किसी जनांदोलन में साहित्यकारों ने इस तरह खुले ढंग से अपनी भूमिका निभाई हो।
 मौन कैसे मुखरता से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांती समझा जा सकता है। यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। 'हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा' जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मियों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ "रेणु' का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को 'रेणु समय' तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक सामान्य अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंगकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, 'अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।'
बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की 'खेल भाई खेल/सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल', सत्यमारायण की 'जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन', गोपीवल्लभ सहाय की 'जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल', रवींद्र राजहंस की 'सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी'। कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाचकर गाते- 'इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को'।
दिलचस्प है कि आंदोलन  में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकलकर सामने आईं। संपूर्ण क्रांति के पीछे का पूरा दर्शन इन रचनाओं में समाया था। आंदोलनकारियों की जुवान पर चढ़े इन गीतों ने शहरों से लेकर सुदूर देहात तक की यात्रा की। इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि आज भी सर्वोदय साहित्य के तहत क्रांति गीतों के जो संकलन छपते हैं उनके सूचीक्रम को यही गीत तय करते हैं। जयप्रकाश अमृतकोष द्वारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ 'जयप्रकाश' में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के 'जयप्रकाश का बिगुल बजा' के अलावा  'हम तरुण हैं हिंद के/ हम खेलते अंगार से' (डा. लल्लन), 'आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है' (राज इंकलाब), 'युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है' (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं।
हिन्दी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था।  आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त 'मोहभंग की कविताओं' या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी अंकन ढूंढे नहीं मिलता है जहां तात्कालिक स्थितयों  को लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दे उक्त नंगी सचाई से मुंह ढापने के लिए शायद ही कुछ मिले। दिलचस्प है कि पटना के आयकर चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने लाठियां बरसाई। बाद में जब वहां उनकी मूर्ति स्थापित की गई तो इतिहास के उस अवसर विशेष को याद करने के लिए धर्मवीर भारती की लिखी 'मुनादी' कविता ही सर्वश्रेष्ठ चुनाव साबित हुआ। इसी तरह तब जेलों में बंद आंदोलनकारी युवाओं की जुबान पर सबसे ज्यादा दुष्यंत कुमार की गजलें थीं। मुख्यधारा से अलग हिन्दी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना के स्वर दिया। मंच पर तालियों के बीच नीरज ने साहस से गाया- 'संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से।'
कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो तो निश्कर्ष के बिंदू आंक खोलने वाले साबित हो सकते हैं। एक बार फिर डा. रघुवंश के शब्दों की मदद लें तो जयप्रकाश आंदोलन के 'कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अगर अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर पर विसर्जित-प्रतिष्ठित किया।'

Thursday, August 18, 2011

खाली सफा


खाली सफा था
कुछ भी लिखता
नाम अपना
बनाता पहाड़
डूबता सूरज
बहती नदी
लाली सांझ की
घोसलों से आती
चुनमुन आवाज
या खेलता खेल
कट्टमकुट्टी का
फिर एक बार
अपने ही खिलाफ 
बहुत साल बाद

खाली सफा था
कुछ भी लिखता
कुछ भी करता
बना लेता नाव
उड़ाता जहाज
दौड़ पड़ता लेकर घिरनी
सामने से आती
हर हवा के खिलाफ
पर नहीं
मन की तिल्ली तो
बनना चाहती थी आग
रगड़ के बाद
चौंध के साथ उड़ता
सबसे तेज धुंआ
पसीने से तर-बतर
सबसे गरम आवाज

Monday, August 8, 2011

वफादार प्रेमियों का टूटा मिथक


दढ़ियल पांडेय जी की प्रेमिका
चिकने बांके द्विवेदी की जांघ पर
कल दोपहर बेसुध मिली
खबर यह इतनी बड़ी कि
दंगों के दौरान पैदा होने वाली
सनसनी भी खोलने लगी
आंचल की पुरानी गांठ

ठाकुर साहब की पूर्व ब्याहता
खिड़की के रास्ते दाखिल होकर
आवारा कुमार के संग
एक ही तकिए पर भिगोती रही रात
झूलती रही झूला
कई सालों तक एक साथ
सचाई यह इतनी बड़ी कि
तथ्य से बड़े सच की तरह
करने लगे सब
मन मसोसकर स्वीकार

प्रेमिका का प्रेम ज्यादा बदला
प्रेमियों के नामों के मुकाबले
प्रेम के बहाने स्त्री अनुभूति का
नया प्रस्थान बिंदु
कितना सघन
कितना सिंधु
रिक्शे पर भाग-भागकर
पुराने प्रेम की गलियों को छोड़ना पीछे
बाइक उड़ा रहे प्रेमी के साथ भरना उड़ान
सपनों से भी आगे क्षितिज के भी पार
नए प्रेम पयर्टन का रोड मैप है
सफर की इस जल्दबाजी में
जो छूट गया पीछे
वह कुछ और नहीं
बस जेनरेशन गैप है

प्रेम एक अनुभव
एक अंतराल लगातार
और दूर तक बजता जलतरंग
एतराज सिर्फ उन्हें जिनके नाखूनों से
छूटने लगे मांसल एहसास
गन्ने के खेत को जो लोग
गुड़-चीनी बनते देखने के हैं आदी
उनके लिए प्रेम होता है
हमेशा रंगीन आख्यान
दांत कटे होठों से
अश्लील शर्बत का पान

प्रेमिकाएं अब बांदी नहीं
पुरुष एहसास के जंगलों को मनमाफिक
झकझोर देनेवाली आंधी हैं
शर्मिंदगी का ऐनक चमकाकर
नहीं मिटाया जा सकता
उनकी आंखों के तीखेपन को
काढ़ने वाला काजल

प्रेम का रंग सिंदूरी नहीं अबीरी है
सौभाग्यवतियों के देश में
पंडितों ने बांचा है नया फलादेश
तीज-करवा के चांद का मुंह है टेढ़ा
यह सीधी समझ बहुत दूर निकल गई
बर्फ की तरह जमी
सदियों की प्रेम अनुभूति
आइसक्रीम की तरह पिघल रही
वफा से ज्यादा
अनुभव का घाटा-मुनाफा
बटोरने में हर्ज क्या है
जब बाजार ने कर ही रखा है घोषित
स्त्री को देह और प्रेम को
नए दौर का सबसे बड़ा संदेह

अब रोती-बिसूरती प्रेमिकाओं के सदाबहार गीत
आकाशवाणी बनकर नहीं फूटेंगे
नहीं टपकेगी रात
किसी वियोगिनी की आंख से
नहीं महकेगी सांस
किसी प्रिय की विदाई-आगमन से
बेवफा प्रेमिकाओं ने
वफादार प्रेमियों का मिथक तोड़ दिया है