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Monday, December 3, 2018

मोमबत्ती का यह उजाला


दूब-घास का हरा मटमैला संसार
गांव-गंवई का देशज विस्तार
एक बिंदू को जबरन रेखा बना देना
अबीरी उल्लास का
सिंदूरी भार से दब जाना
एक सपनीली रात का गर्भपात
संस्कृति का अपनी ही बेटी के साथ
परंपरागत विश्वासघात है

अनुभव की यह दुहाई
पहले एक लड़की देती थी
अब एक औरत देती है
अपनी ही आंखों में
ओझल हुए सपनों को
चिड़ियों की तरह बुलाते हुए
भाषा की अंजुरी में अपने आंचल का
सबसे कीमती प्रसाद रखते हुए
मानवता की देहरी पर
अंतिम दीया बालते हुए

एक औरत में
एक लड़की की खोज पूरी करना
सिंदूर की लाली को
मलाल से भर देना नहीं
एक अहसास को
तर-बतर कर देना है
एक सुखी नदी को
फिर से सजल कर देना है
दिल को तार और
दिमाग को बुखार लिखने वाले
हैरान हो सकते हैं
साड़ी के कोर को
फ्रॉक का रिबन बनते देख

कौमार्य को धो देने
जवानी को खो देने के बाद भी
बची रह जाती है एक लड़की
संवेदना की किसी निर्जन बस्ती में
शब्दों के बगीचे में
किसी अनजान डाल पर
झूलते हुए झूला
भरती हुई किलकारी
लहराती हुई केश

अंगों के स्पर्श को
इच्छाओं के संघर्ष को
अनुभूति के द्वंद्व का नाम देकर
दुनिया चाहे लाख खेलती हो
शह-मात का खेल
पर 21वीं सदी के
दूसरे दशक की दस्तक बनी
आधी दुनिया ने
खेल के सारे नियम बदल दिए हैं
धोखे से प्यार चखने वाले
अब प्यार के नए
चोखे हथियार से हार रहे हैं
इश्किया मुहावरों की
अपनी थाती को
अपने ही हाथों सिधार रहे हैं

आज ऐसी ही एक लड़की ने
औरत के जिस्म से बाहर आकर
जलाई है मोमबत्ती
अपने नाम से
अपने जन्म लेने की
सालाना घोषणा करते हुए
मोमबत्ती का यह उजाला
हमारे समय के
सबसे घनघोर
अंधकार के खिलाफ है

Thursday, September 27, 2018

चेहरा




मैं तुम्हारे चेहरे पर हंस सकता हूं
मैं तुमसे पूछ सकता हूं
कि कोयले के खदान में क्या
कम पर गया था चट्टान
मैं कह सकता हूं कि तुम स्थगित कर दो
अपने चेहरे को अपने अस्तित्वबोध से

मैं तुम्हारे सामने नहीं खोल सकता
अपने महंगे कैमरे का लेंस
सौंदर्य को नरम के साथ
पोर्न मैगजीन को अपने बदन पर अोढ़ने वाले
कागज की तरह होना चाहिए मांसल
इश्तेहारों के दौर में
यह बयान सुलेख की तरह कंठस्थ है मुझे

मैं तुम्हारे चेहरे पर मलना चाहता हूं अवलेह
जिसे श्रम की भट्टियों की
महंगी राख से बनाया गया है
मैं बदल देना चाहता हूं तुम्हारा चेहरा
जैसे बाजार में बार्बीज
बदलती रहती है अपना लुक

मैं तुम्हारे चेहरे पर कविता लिखना चाहता हूं
पर कोई भी शब्द साथ देने को नहीं तैयार
संवेदना की विनम्र कोशिश
कैसे हाथ मलते रह जाती है
यह विवशता असहनीय है मेरे लिए
मैं इस असहनीयता से दूर निकलना चाहता हूं
रिहाई चाहता हूं मैं तुम्हारे चेहरे की बजती जंजीरों से 

तुम्हें लिखने की कोशिश में
कसीदे काढ़ने लग जाता हूं मैं
उन संगमरमरी पत्थरों के बने बूतों के
जिन्हें इतिहास के सबसे क्रूर राजाओं ने
नींद की गोली की तरह इस्तेमाल की गईं
लौंडियों के नाम पर बनवाए हैं

मैं तुम्हारे चेहरे को इस सदी से बाहर
पांच हजार साल की स्मृति से बाहर
फेंक देना चाहता हूं
नहीं है एेसे चेहरे की अब कोई गुंजाइश
बीत चुका है एेसे चेहरों का दौर
सरकार से लेकर संवाद और संवेदना
सबके डिजिटल हो जाने के बाद

चेहरे मतलब रंग होता है
चेहरा रौनक की बड़ी बहन है
काला या सांवला कोई रंग नहीं
अभिशाप है अभिशाप
चॉकलेट के रैपर से लेकर
भगवान की किताब तक
आज सब रंगीन हैं
सबके आवरण पर है
रौशनी का महोत्सव

मैं तुम्हें चेहरा कहना भी नहीं चाहता
तुम चेहरा हो भी नहीं सकती
तुम तो छाया हो बस
एक एेसी छाया
जो कभी मेरे सिर के ऊपर से
तो कभी पांव के बीच से गुजरी है
एक एेसी छाया
जो मन के धूप को रोक लेती है
खुद को और जलाने के लिए

तुम्हारे चेहरे पर मेरी आंखें मेरे सपने
दोनों मिलकर रोज गाते हैं शोकगीत
एक एेसा शोकगीत
जो चेहरे को सौंदर्य
और सौंदर्य को मांसल खरोंच से भर देने की यातना पर
अभिभूत न होने के दुख से जन्मा है

तुम्हारे चेहरे के कारण
आईनों ने झूठ बोलना सीख लिया है
इन आईनों ने ही तो सबक रटाया है औरत जात को
कि वह चेहरे को सिंदूर की सीध में नहीं
किसी पुरुष की रीढ़ में देखे
कि चेहरा सौंदर्य की डाल पर खिलने के लिए
नाखूनों में भरने के लिए होता है
संस्कृति और विकास का तेजाब मलने के लिए होता है

#रोप्रे
27.09.18


Saturday, September 22, 2018

शुष्कता अब शर्मनाक है



अच्छा है नभ बरस रहा है
बाहर-अंदर सब भींग रहा है
घोषित है हर ओर आद्रता
                पानी से मनमानी खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

सोचा था वो एेसे होंगे
सोचा था वो वैसे होंगे
सोचा उसकी सोच के बाबत
                सोच बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

पूरब को पुरबाई कह देना
वचन-वचन को गहराई
कुछ को कुछ लिख देना यूं ही
                आदत बहुत खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

कुछ शब्द लिफाफे के भीतर
कुछ बात दबे तकिए के नीचे
कुछ शब्द हो गए सहयात्री
                संवाद बहुत यह खतरनाक है
                शुष्कता अब शर्मनाक है

#रोप्रे
22.09.18

Tuesday, September 11, 2018

अंग्रेेजी शिक्षिका


मेरी अंग्रेजी मेरे खिलाफ जा रही है
मुझे जो हिन्दी याद नहीं
वो अब याद आ रही है
मैं अंग्रेजी की लिखावट में
नहीं लिख सकती अपना गांव
यादों में तरोताजा सहेलियों की चुहल
शादी से पहले अलग बुलाकर कही 
भाभी की वो गुदगुदा देने वाली बात

हिन्दी वैसी है
जैसे मैं बांधती हूं अपने केश
एक ही हेयर बैंड को दोहरा-तिहरा कर
मेरी साड़ी भी मेरी हिन्दी की तरह है
साड़ी कोई हो मुझे सिंदूरी लगती है
जब भी देखा छूकर पहनकर

मैंने अंग्रेजी शौक से पढ़ी है
अच्छे अंक आए हैं इसमें
हिन्दी में बिंदी गलत नहीं लगनी चाहिए
स्कूल में यह सीख नाकाम रही
आज अपनी बेटी को दुलारते हुए
स्कूल की पोशाक पहनाते हुए
खूब आई याद
झूलते हलंत और बिंदी की बात

हिन्दी मुझे अपने छोटे से शहर के जंगल में
निर्भीक साइकल पर घूमने की हिम्मत देती है
जहां जानवर भी करते हैं हिन्दी में बात
जहां नो एंट्री जैसा कोई डरावना साइनबोर्ड नहीं
न ही किसी हाथ में एसिड की बोतल है

मैं अंग्रेजी की शिक्षिका हूं
साफ-सुथरी अंग्रेजी पर पूरे अंक देती हूं बच्चों को
पर मेरा स्त्री मन
मेरी सोच मेरा रहन
सब हिन्दी वर्णमाला है
इससे कीमती मेरे पास बहुत कुछ है
पर इससे जरूरी कुछ भी नहीं
क्योंकि अंग्रेजी में मुझे संझा-बाती नहीं आती
मैं नहीं गा सकती अंग्रेजी में आरती



11.09.18

Wednesday, September 5, 2018

सिमोन फिदा है



तेरे मीनार पर चढ़कर
तुम्हारी दीवार पर जाकर
कोई कुछ भी लिख दे
यह कोई लापरवाही नहीं
एक सुनियोजित
सुविचारित जनतंत्र है
जिस पर लिंकन तो दुखी
पर सिमोन फिदा है

अस्मिता का कलश
बौद्धिकों के हाथों में
सर्वाधिक असुरक्षित है
आधी दुनिया की इस पूरी समझ को
नारा या विरोधी तख्ती की दरकार नहीं
उसे संवेदना का लोकतंत्र
और लोकतंत्र की संवेदना
दोनों की संभाल आती है

इनबॉक्स के घुसपैठिए तो होते हैं
एकदम आवारा पूंजी की तरह
कहीं भी लग्गी से नापकर
अपने साम्राज्य का ग्लोब नचाने वाले
झूठ को शहद
और सच को संग्रहालय की चाबी थमाने वाले

प्यार कुंठा का नहीं
भीतरी तंदुरुस्ती का शास्त्र है
सिंदूर से पहले सपना
सिंदूर के बाद पक्षी विहार है
समझ का ये पानी नहीं समा सकता
यूं ही प्यार की पवित्रता बांट रहे
पंडों के कमंडल में

नारी सशक्तीकरण का नया दौर
लैंगिक समकोण का नया दृष्टिकोण
घर की रसोई में पकी नई रोटी
बेगम अख्तर की ठुमरी की
अपडेटेड फरमाइश है

05.09.18

Saturday, September 1, 2018

मोहल्ले का नायक


गर्म धूप की सेंक से
पक रही हैं लड़कियां
मोहल्ले की लड़कियां
फरवरी के महीने में
बरामदे की कुर्सियों पर
छत पर बिछी चटाई पर
खुले लॉन में
ऊन के फंदों में
कस रही हैं लड़कियां
बैडमिंटन के कोर्ट में
शटल के पंखों से
उड़ रही हैं लड़कियां

लड़कों का क्रिकेट बॉल
उड़ा ला रहे हैं लड़कियों की बातें
नयी पकी खुशबू की सौगातें
नहीं कर पा रहे हैं यही काम
ऊपर उड़ रहे कई पतंग
प्रयास के बावजूद

सबको पता है कि
शाम से पहले तीन-साढ़े तीन बजे
इस वासंती मुहूर्त का नायक यहां नहीं है
वहां लड़कियों की बातों से भी
उसकी टोह मुश्किल है
बची कविता
तो वह भला यहां कैसे हो सकता है
वैसे यह कहना भी फिजूल है
यह जानने के बाद कि
वह धड़कनों का चित्रकार है
और इस साल वसंत के पास
उसी की कूची से धुला आईडेंटीटी कार्ड है

Friday, August 31, 2018

भाषा का न्यूटन


1.
भाषा के न्यूटन ने जब लिखा होगा
संधि विच्छेद का नियम
तब पैदा नहीं हुए होंगे चाणक्य
न ही होती होगी
राज्यों के बीच संधि
न होती होंगी शिखर वार्ताएं
न बनाता होगा कोई बढ़ई गोलमेज
तब बकरी की भाषा बोलने का
नहीं करता होगा कोई लोमड़ी रियाज
तब शरणार्थी
खैराती शामियाने के नीचे सिर छिपाने के लिए
नहीं करते होंगे फरियाद

2.
भाषा के न्यूटन ने
जब देखा होगा पहली बार दूरबीन से
भाषा में समास को
तब नहीं बने होंगे ब्रांड
न करती होंगी लड़कियां कैटवॉक
नए लिंग निर्णय के साथ

3.
रेहड़ी-पटरी पर बैठा प्रत्यय
आज जुमलों की अट्टालिकाएं देखकर
भाषा के न्यूटन को कोसता है
भाषा भी एक कूटनीति है
रात को अपनी रोटी
पत्नी की थाली में रखकर सोचता है
01.09.18

Monday, November 24, 2014

प्रतिभा की कलम से द्रौपदी


ज्ञानपीठ पुरस्कार को इस साल पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह अलग बात है कि इस साल 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई है, जो वरिष्ठ हिदी कवि केदारनाथ सिह को दिया गया है। वर्ष के हिसाब से केदारजी को यह सम्मान 2०13 के लिए दिया गया है।
अपनी अर्धशती लंबी इस यात्रा में भारतीय भाषाओं के इस सर्वोच्च और सर्वमान्य माने जाने वाले पुरस्कार को लेकर हर हलके में एक सम्मान का भाव रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण इसका कम विवादित रहना रहा है। पुरस्कारों के अवमूल्यन के दौर में यह उपलब्धि बड़ी बात है।
मुझे याद है कि 2०11 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई तो एक साथ मोबाइल फोन और ईमेल पर कई मैसेज आने लगे। इनमें ज्यादातर इस सूचना को साझा करने वाले थे कि इस बार ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडिèया कथाकार प्रतिभा राय।
ताज्जुब हुआ कि गूगल के सर्च इंजन पर एक हफ्ते के अंदर इतनी सारी सामग्री इकट्ठा हो गई कि जिन्होंने पहले प्रतिभा जी को नहीं पढ़ा था, वे भी इस बारे में कई रचनात्मक तथ्यों से अवगत होने लगे। हिदीप्रेमियों के फ़ेसबुक वाल पर प्रतिभा जी की नई-पुरानी तस्वीरें साझा होने लगीं। साथ में सबके अपने मूल्यांकन और टिप्पणियां। हिदी की कई पत्रिकाओं ने इस अवसर पर या तो अपने विशेषांक निकाले या फिर प्रतिभा राय की कहानियों को पुनर्पाठ के लिए पाठकों को प्रस्तुत किया। ईमानदारी से कहूं तो पुरस्कार की घोषणा के बाद ही मैंने भी प्रतिभा जी के बारे में काफी कुछ पढ़ा और जाना-समझा। खासतौर पर उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'द्रौपदी’
को लेकर।
प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडिèया से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी’। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य’ लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समकालीन जीवन के गठन और चिताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिबात्मक’ औजार से ज्यादा जरूरी है- 'कथात्मक हस्तक्षेप’। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए प्रतिभा राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी’ में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी’ उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद है।

Monday, November 3, 2014

पूरबिया बरत

पनघट-पनघट
पूरबिया बरत
बहुत दूर तक
दे गई आहट
शहरों ने तलाशी
नदी अपनी
तलाबों-पोखरों ने भरी
पुनर्जन्म की किलकारी
गाया रहीम ने फिर
दोहा अपना
ऐतिहासिक धोखा है
पानी के पूर्वजों को भूलना
***
पानी पर
तैरते किरणों का दूर जाना
और तड़के
ठेकुआ खाने
रथ के साथ दौड़ पड़ना
भक्ति का सबसे बड़ा
रोमांटिक यथार्थ है
आलते के पांव नाची भावना
ईमेल के दौर में
ईश्वर से संवाद है
मुट्ठी में अच्छत लेकर
मंत्र तुम भी फूंक दो
पश्चिम में डूबे सूरज की
पूरब में कुंडी खोल दो
***
डाला-दौरा
सूप-सूपती
फल-फूल
पान-प्रसाद
मौली बंधे हाथों से
पूरा होता विधान
पुरोहित कोई
न कर्मकांड
लोक की गोद में
खेली परंपरा
पीढ़ियों की सीढ़ी पर
गाती रेघाती है
बोलता है नाचते हुए
जब भी कोई गांव
वह पांव बन जाती है

Sunday, January 6, 2013

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

Sunday, July 8, 2012

डेस्क पर दुष्कर्म


रौंदे गए खेत की तरह
पहुंची वह डेस्क पर
भरभरा कर ढहती
मिट्टी का सिलसिला
शिथिल पड़ गया था
पर थमा नहीं था बिल्कुल
पुलिस लग गई थी छानबीन में
सुराग की छेद में समाया था
टीचर से ब्वॉयफ्रेंड बना गिरिधारी

कवर की बॉटम होगी
पूरे पांच कॉलम की
उघड़ी खबर की आंखें
कल शहर की तमाम आंखों की
तलाशी लेगी

घबराना नहीं तुम
छंटने लगे बेहोशी तब भी
कल कोई नहीं पहचानेगा
भरभरा कर झरती
दोबारा इस मिट्टी को
बदनाम तो होगी वह
जिसे सूंघते फिरंगे सब
सड़कों-मोहल्लों पड़ोस में
और हम
हम तो होंगे बस
पेशेवर चश्मदीद
भेड़ियों की पीठ पर
शरारतन धौल जमाते

अगले नाम से फिर एक बार
दोहराया गया दुष्कर्म
हौले-हौले फूंक-फूंककर
मर्दाना शहर में बढ़ गई अचानक
मांदों की गिनती
पिछले साल पांच सौ छब्बीस
इस साल अगस्त तक
चार सौ इक्कीस

स्कूल में पढ़ने वाली
मालती को क्या पता था
सबक याद कराने वाला मास्टर
उसे क्या रटा रहा है
देर शाम बेहोश मिली मालती
कोचिंग सेंटर के आखिरी कमरे में

चालीस फोंट की बोल्ड हेडिंग
लुट गई मालती दिन-दहाड़े
खुलती आंखों का भरोसा
फिर से सो गया
लोकशाही के चौथे खंभे का
हथकंडा देखकर

Monday, January 9, 2012

वीरांगनाओं की युद्धनीति


कूल्हों के झटकों पर
मौसम नहीं बदलते
शेयर दलालों की बांछें भले खिल जाएं
उघड़ी टांगों पर तैरती फिसलन
या तो बरसाती है
या सोची-समझी शरारत

पेज थ्री की जंघाओं में
मचलती जिन मछलियों ने
ड्राइंग रूम के लिए
कराया है इक्वेरियम का अविष्कार
समझ लेना होगा उन्हें
कि रैंप पर चलने वालों को
पहाड़ पर चढ़ना मना है

रेन डांस में लहराती गोपिकाओं से
जबरिया छीन लिया गया है
मटका भरने का हुनर
न्योन लाइट से सजे इश्तेहार
बस नीले हो सकते हैं
या हो सकते हैं खतरनाक लाल
पाबंदी है इनके सिंदूरी होने पर

रंग-बिरंगी लट्टुओं में नहायी दुनिया के
सबसे ताकतवर मदारी का डमरू
तांडवी हो जाता है
उम्रदराज झुर्रियों को देखकर
लंबी छरहरी गुस्ताखियों के लिए
शहर के हाशिये पर बना ओल्डएज होम
नया रिलिजियस स्पॉट है
कच्चे सूत से पक्की गांठ बांधने वाला
पंडित भी फूंक नहीं पा रहा कोई मंत्र
जिससे दुनिया के सारे फोटोग्राफरों के
निगेटिव एक साथ धुल जाएं

अलबत्ता सवाल यह भी है कि
अब तक आंगन लीप रही औरतों
कोहबर सजा रही लड़कियों की दुनिया
किस छाते में खड़ी है
किन जंघाओं में खेलती हैं ये
सपनों के किन बगीचों में मिल जाती हैं
नीम कौडि़यां इन्हे आज भी

नया भूगोल ढूंढ़ रहे वास्कोडिगामा
है कमीज तुम्हारे पास
जिसे पहन तुम
नया सबेरा आंज रही
इन ललनाओं से मिल सको
खतरा है इतिहास लिख रहे
नये मिस्त्रियों के औजार
कहीं लूल्हे साबित न हों
सुंदर पति पाने के लिए
अब भी सोमवारी करतीं
वीरांगनाओं की युद्धनीति समझने में 

Saturday, October 8, 2011

स्पर्शसुख का जैकपॉट


पहला शब्द पुरुष
फिर चुनिंदा फूल
और भीना-भीना प्यार
गोदने की तरह
चमड़ी में उतरे हैं शब्द कई
नीले-नीले हरे कत्थई
नंगी पीठ पर उसकी
थोड़ा ऊपर
बस वहीं
एकदम पास
उत्तेजना की चरमस्थली
स्पर्शसुख का जैकपॉट

सच
शादी की रजत वर्षगांठ पर
वह सिर्फ पति नहीं
उस कला संग्रहालय का
मालिक भी है
जहां के हर बुत में 
उतनी ही जान है
जितनी हथेली और
नाखूनों को चाहिए

Sunday, October 2, 2011

सौ नंबर पर प्यार


पांव से छिटककर दूर
जब बजने लगे पायल
तो बदहवासी में
सौ नंबर पर डॉयल

मनुहार का अत्याचारी सच
बयां करने वाली
पुलिस थाने में धूल खा रही फाइल
प्यार के चर्मरोग का
इलाज बताएं न बताएं
इस बीमारी के गलगला गए
यथार्थ को मुहरबंद जरूर करती हैं

Monday, August 8, 2011

वफादार प्रेमियों का टूटा मिथक


दढ़ियल पांडेय जी की प्रेमिका
चिकने बांके द्विवेदी की जांघ पर
कल दोपहर बेसुध मिली
खबर यह इतनी बड़ी कि
दंगों के दौरान पैदा होने वाली
सनसनी भी खोलने लगी
आंचल की पुरानी गांठ

ठाकुर साहब की पूर्व ब्याहता
खिड़की के रास्ते दाखिल होकर
आवारा कुमार के संग
एक ही तकिए पर भिगोती रही रात
झूलती रही झूला
कई सालों तक एक साथ
सचाई यह इतनी बड़ी कि
तथ्य से बड़े सच की तरह
करने लगे सब
मन मसोसकर स्वीकार

प्रेमिका का प्रेम ज्यादा बदला
प्रेमियों के नामों के मुकाबले
प्रेम के बहाने स्त्री अनुभूति का
नया प्रस्थान बिंदु
कितना सघन
कितना सिंधु
रिक्शे पर भाग-भागकर
पुराने प्रेम की गलियों को छोड़ना पीछे
बाइक उड़ा रहे प्रेमी के साथ भरना उड़ान
सपनों से भी आगे क्षितिज के भी पार
नए प्रेम पयर्टन का रोड मैप है
सफर की इस जल्दबाजी में
जो छूट गया पीछे
वह कुछ और नहीं
बस जेनरेशन गैप है

प्रेम एक अनुभव
एक अंतराल लगातार
और दूर तक बजता जलतरंग
एतराज सिर्फ उन्हें जिनके नाखूनों से
छूटने लगे मांसल एहसास
गन्ने के खेत को जो लोग
गुड़-चीनी बनते देखने के हैं आदी
उनके लिए प्रेम होता है
हमेशा रंगीन आख्यान
दांत कटे होठों से
अश्लील शर्बत का पान

प्रेमिकाएं अब बांदी नहीं
पुरुष एहसास के जंगलों को मनमाफिक
झकझोर देनेवाली आंधी हैं
शर्मिंदगी का ऐनक चमकाकर
नहीं मिटाया जा सकता
उनकी आंखों के तीखेपन को
काढ़ने वाला काजल

प्रेम का रंग सिंदूरी नहीं अबीरी है
सौभाग्यवतियों के देश में
पंडितों ने बांचा है नया फलादेश
तीज-करवा के चांद का मुंह है टेढ़ा
यह सीधी समझ बहुत दूर निकल गई
बर्फ की तरह जमी
सदियों की प्रेम अनुभूति
आइसक्रीम की तरह पिघल रही
वफा से ज्यादा
अनुभव का घाटा-मुनाफा
बटोरने में हर्ज क्या है
जब बाजार ने कर ही रखा है घोषित
स्त्री को देह और प्रेम को
नए दौर का सबसे बड़ा संदेह

अब रोती-बिसूरती प्रेमिकाओं के सदाबहार गीत
आकाशवाणी बनकर नहीं फूटेंगे
नहीं टपकेगी रात
किसी वियोगिनी की आंख से
नहीं महकेगी सांस
किसी प्रिय की विदाई-आगमन से
बेवफा प्रेमिकाओं ने
वफादार प्रेमियों का मिथक तोड़ दिया है

Wednesday, July 27, 2011

अबीर हुई लड़की


(1)
प्यार
प्यार का पुनर्पाठ
अभिनय की तरह कई बार के रिटेक में
फाइनल शॉट का अभ्यास
एक जनतांतित्रक मसला तो है
पर संवैधानिक नहीं
सवाल उगाती समझदारी है यह
उस अधीर लड़की की
जो भूल से प्यार भले न सही
पर प्यार में चूक जरूर कबूलती है
प्यार का मर्म कोमल धर्म
उसे रह-रहकर कचोटता है
अपने ही किए को
कसौटी बनाने के जोखिम से

(2)
पिछले दरवाजे से स्वाधीन हुआ प्रेम
सामने के दरवाजे पर खड़ा
बड़ा सवाल है
वह लड़की आज भी अधीर है
बाल को संवारने जैसा
जिंदगी की संभाल के लिए

(3)
प्यार को रोक नहीं पाना
एहसास की सिहरन जागते ही
तकिया-रजाई हो जाना
महज समय के दोशाले में लिपटी
खरगोशी गरमाहट नहीं
समय के सबसे तेज साफ्टवेयर पर
डाउनलोड किया गया एप्लीकेशन भी है

(4)
...तो क्या एक अधीर लड़का ही
आखिरकार गढ़ता है
एक अधीर लड़की का प्रेम
उसका मन
उसका मिजाज
उसका पूर्व उसका आज
बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान
समय से ऊंची मचान
तीखे तीर शातिर कमान

(5)
अबला को
बला की संभावनाओं से भर देना
आजादी के नाम पर की गई
मालफंक्शनिंग नहीं तो और क्या है

(6)
लैंगिक समता के अलंबरदारों बताओ
एक लड़की का बेडरूम की तरह इस्तेमाल
उसे जिस हाल तक देता है पहुंचा 
वहां कितना बचता ही है दमखम
एक अधीर हुई
अबीर हुई लड़की के पास
कि वह फिर से करे प्यार
अपने किए-कराए पर पुनर्विचार
या कि आंखों को काजल कर देने वाले
आंसुओं पर एतबार

Friday, July 22, 2011

मर्दाना तर्क जनाना हाथों में

(1)
याद आता है
अभिनेता महान का हिट संवाद
मर्द को दर्द नहीं होता जनाब
गूंजती है आवाज
सनसनाहट से भरी एमएमएस क्लिप में
बांग्ला की कुलीन अभिनय परंपरा की बेटी की
आई वांट ए परफेक्ट गाइ  
और फिर उतरने लगते हैं पर्दे पर
एक के बाद एक दृश्य
शालिनी ने लकवाग्रस्त पति को
दिया त्याग रातोंरात
अधेड़ मंत्री के यहां पड़े छापे में मिली
पौरुष शास्त्र की मोटी किताब
वियाग्रे की गोलियां
मुस्टंड मर्दानगी के लिए ख्यात
हकीम लुकमान के लिखे अचूक नुस्खे
मिस वाडिया ने अपनी आत्मकथा में
उड़ाया इंच दर इंच मजाक
अपने सहकर्मी की गोपनीय अंगुली का

(2)
नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं
उन्हें नहीं मिलेगी तोशक न मिलेगी रजाई
न वे झूल सकेंगे झूला न बना सकेंगे रंगोली
और न खेल सकेंगे होली
अवैध मोहल्लों के किसी गली-कूचे या मैदान में
 ऊंची एड़ी पर खड़ी दुनिया
 नहीं देखना चाहती किसी नामर्द की शक्ल
अपनी किसी संतान में

(3)
मर्द न होना किसी मर्द के लिए 
बिल्कुल वैसा ही नहीं है
जैसा किसी औरत का न होना औरत
स्त्री-पुरुष का लिंग भेद मेडिकल रिपोर्ट नहीं
बीसमबीस क्रिकेट का स्कोर बोर्ड
करता है जाहिर
पुरुष इस खेल को सबसे तेज और
जोरदार खेलकर ही साबित हो सकते हैं जवां मर्द
और तभी मछली की तरह उतरेगी
उसके कमरे में कैद तलाब में कोई औरत

(4)
मर्दाना पगड़ी की कलगी खिलती रहे
अब ये चाहत नहीं चुनौती है पुरुषों के आगे
उसे हर समय दिखना होगा
सख्त और मुस्तैद
नहीं तो सुनना पड़ सकता है ताना
वंशी बजाते हुए नाभी में उतर जाने वाले कन्हाई
कहीं पीछे छूट गए
औरतों ने देना शुरू कर दिया है
पुरुष को पौरुष से भरपूर होने की सजा
जिस औजार से गढ़ी जाती थीं  
अब तक मन माफिक मूर्तियां
अब उनका इस्तेमाल मिस्त्री नहीं
बल्कि करने लगे हैं बुत
मैदान वही
बस  योद्धाओं के बदल गए हैं पाले
मर्दाना तर्क जनाना हाथों में
ज्यादा कारगर और उत्तेजक रणनीति है
जैसे को तैसा...
जनाना न्याय का उध्बोधन गीत है

Friday, July 8, 2011

बार्बी


रंगों को बरमुडा की तरह पहन फिरने वाली 
बादलों को पतंगों की तरह आसमान में टांकने वाली 
मौसम को छतरी की तरह ताने
 जयपुरिया रेत से मुंहजोड़ी करने वाली 
जिंदगी को ऐश्वर्या राय का लार्जर कट आउट कहने वाली 
पकड़ को आइसक्रीम और रगड़ को पास्ता जैसा चखने वाली 
सख्त बर्फीले चट्टान पर निर्वस्त्र कंदील की तरह जलने वाली 
आंखों की लाल डोरी से खिंचे झुले में 
बदहवास हिंडोले भरने वाली 
बर्बर बार्बियों ने ट्रेजडी का नया आख्यान लिखा है 
रात के तकिए पर सबसे तेज शराब का नाम लिखा है
 दुनिया को कायर... खुद को महान लिखा है... 

Thursday, July 7, 2011

परपुरुष


कल जब तुम्हारी शर्ट की कालर पर
जमी देखी कीचट मैल तो मिचलाने लगा मन
लड़खड़ाते देखा किसी अव्वल बेवरे की तरह
तो घबड़ाने लगा मन
प्रेम मैं करती थी तुम्हीं से
किया था खुद से ही वरण तुम्हारा
पर फैसला यह शरमाने लगा
तुम्हारे नाम का पल्लू ओढ़ूं आजीवन
जीवन ऐसा गंवारा नहीं लगा
मेरी कोख से होगा पुनर्जन्म तुम्हारा
सोचकर दरकने लगी मेरे अस्तित्व की धरती
भर-भराकर कर गिरने लगा
सिंदूरी सपनों का आसमान

तुम्हारी गोद में ही ली मैंने
किसी परपुरुष के सपने का सुख पहला
देहगंध का संसर्ग बदलने की हिमाकत
विद्रोह की तरह था मेरे लिए
तुम्हारे साथ रखकर ही शुरू कर दी मैंने
किसी और के होने की प्रार्थना
मांगने लगी मनौती छुटकारे की
देह का धधकता दाह
जला दे रही था वह सब
जो तुम्हारे नाम से दौड़ा था कभी नसों में मेरी

बचाने की कोशिश तो की भरसक तुमने
संबंध की अनजाने ही ढीली पड़ती गांठ को
पर जतन के हर पासे को पलटता देख
खोने लगे संतुलन
पटकने लगे थाली
बरबराने लगे गाली
जिन बालों पर फेरकर हाथ तुमने दिया था कभी
अनंत प्यार का भरोसा
वह मेरी मुंहजोर बेवफाई का
बना पहला शिकार
नोचे बेरहमी से तुमने बाल मेरे
कभी पागल कर देने वाली गोलाई पर
टूटा तुम्हारे हाथ से रेत की तरह सरकते जाते
प्यार का भिंचभिंचाता गुस्सा

इस झंझावात का सामना करना
भले दुश्वार था मेरे लिए
बिलख उठती थी मैं
तुमसे बार-बार दागे जाने के बाद
पर यही तो था वह जंगल
जिसे चाहती थी मैं पहले उगाना
और बाद में खुद उसमें फंसना
फिर कर लेना चाहती थी इसे जैसे-तैसे पार

तुम नहीं मेरे प्यार
कर नहीं सकते तुम मुझे प्यार
इस सच को सधा होना ही नहीं
अंतिम होना भी जरूरी था
प्यार के रेशमी रिश्ते के टूटने का
लौह तर्क आखिरकार जीत गया
देखते-देखते ही देखते
तुम और तुम्हारा साथ बीत गया
और इस तरह एक दिन फूंक दिया मैंने
तुमसे मुक्ति का महामंत्र

तुम्हारे साथ होने की ठिठुरन
जिस रजाई को ओढ़कर करती रही दूर
जिसके सपनों के तकिए पर काढ़ती रही
सपनों के फूल
तुम्हें खोने का सुख
जिसके पास होकर देता रहा
गहरी लंबी सांस जैसा सुकून
प्यार वह सहारा जैसा था
सहारा वह भूख जैसी थी
भूख वह देह जैसी थी
और देह वह जलाता रहा
मेरी बिंदास चेतना का अलख
भरमाई आंखों से पूजती रही मैं
दीर्घ और विद्रोही इच्छाओं का महाकलश

सेल नंबर तुम्हारा


बदल गया है कितना कुछ
इस बीच
तब का देखा
देख रहा हूं आज
कितने सालों बाद
बदल गई हो कितनी तुम

नहीं लगती बिल्कुल पहले जैसी
न हैं आदतें वैसी
न बोलने-बतियाने का अंदाज वैसा
सपनों से मुंह चुराती अपनों से रीती बातें
गहनों कपड़ों रंगों को लेकर नजरिया
बालों को बांधने-खोलने के सलीके
कितने बदल गये हैं इस बीच

पर शायद सब कुछ इतना
बदल नहीं पाता
बदल न पाते हालात इतने
बदला न होता इस बीच
अगर सेल नंबर तुम्हारा